उग्रवादी चरण

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: उग्रवादी चरण एवं सूरत विभाजन (1907) का संपूर्ण विश्लेषण

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उग्रवादी चरण (1905–1919) एक ऐसा मोड़ था जिसने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत की भावी राजनीति की पूरी दिशा ही बदल दी। इसे समझना न केवल इतिहास बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

1. उग्रवादी चरण (Extremist Phase) का विस्तृत परिचय

1885 से 1905 तक कांग्रेस पर उदारवादियों (Moderates) का प्रभाव था, जो प्रार्थना पत्रों, स्मरण पत्रों और संवैधानिक तरीकों (3Ps: Prayer, Petition, Protest) में विश्वास रखते थे। परंतु जब अंग्रेजों ने इन माँगों को अनदेखा किया और 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया, तो भारतीय युवाओं में भारी असंतोष फैला। यहीं से उग्रवादी विचारधारा का जन्म हुआ।

मुख्य नेताओं का योगदान (लाल-बाल-पाल और अरविंदो घोष)

  1. लाला लाजपत राय (पंजाब):

    • उपाधि: ‘शेर-ए-पंजाब’ या ‘पंजाब केसरी’।

    • विचारधारा: वे मानते थे कि भीख माँगने से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, इसे छीनना पड़ेगा।

    • योगदान: उन्होंने ब्रिटेन जाकर भारत की वास्तविक स्थिति का प्रचार किया और अमेरिका में ‘इंडियन होम रूल लीग’ की स्थापना की।

  2. बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र):

    • उपाधि: ‘लोकमान्य’ (अंग्रेज इन्हें ‘भारतीय असंतोष का जनक’ कहते थे)।

    • नारा: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”

    • रणनीति: उन्होंने जनता को एकजुट करने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक मंचों का उपयोग किया—

      • समाचार पत्र: मराठी भाषा में केसरी और अंग्रेजी में मराठा।

      • उत्सव: 1893 में गणपति उत्सव तथा 1895 में शिवाजी उत्सव की शुरुआत की।

  3. विपिन चंद्र पाल (बंगाल):

    • उपाधि: ‘भारत में क्रांतिकारी विचारों के जनक’।

    • योगदान: इन्होंने स्वदेशी आंदोलन के दौरान पूरे देश का दौरा किया और बहिष्कार (Boycott) को एक राजनीतिक हथियार बनाया। उनका स्पष्ट मानना था कि विदेशी सामान के साथ-साथ अंग्रेजों के शासन का भी पूर्ण बहिष्कार किया जाए।

  4. अरविंदो घोष (बंगाल):

    • सिद्धांत: इन्होंने ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (Passive Resistance) की अवधारणा दी।

    • विचार: इनका कहना था कि यदि ब्रिटिश सरकार कर असूलती है और बदले में शोषण करती है, तो भारतीयों को कर देना बंद कर देना चाहिए और सरकारी सेवाओं का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए।

2. सूरत विभाजन (Surat Split: 1907) का गहरा विश्लेषण

1907 में ताप्ती नदी के तट पर सूरत में आयोजित कांग्रेस के 23वें अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो धड़ों में बँट गई: गरम दल (Extremists) और नरम दल (Moderates)।

सूरत विभाजन के पीछे के मुख्य कारण

  • आंदोलन के कार्यक्षेत्र पर मतभेद:

    • गरम दल: स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को केवल बंगाल तक सीमित न रखकर पूरे भारत में फैलाना चाहता था।

    • नरम दल: आंदोलन को केवल बंगाल तक और केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक ही सीमित रखना चाहता था।

  • अध्यक्ष पद को लेकर विवाद (तत्कालिक कारण):

    • 1907 का अधिवेशन पहले नागपुर में होना तय था। नागपुर गरम दल का गढ़ था, इसलिए वे लाला लाजपत राय या बाल गंगाधर तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहते थे।

    • नरम दल ने चालाकी से अधिवेशन का स्थान बदलकर सूरत कर दिया। नियम के अनुसार, मेजबान प्रांत का व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बन सकता था, जिससे तिलक अध्यक्ष पद की रेस से बाहर हो गए।

    • नरम दल ने रासबिहारी घोष को अध्यक्ष चुन लिया, जिससे दोनों दलों के बीच बहस हिंसक रूप ले बैठी।

  • 1906 के कोलकाता प्रस्तावों पर खींचातान:

    • 1906 के कोलकाता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में ‘स्वराज’, ‘स्वदेशी’, ‘बहिष्कार’ और ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ के जो 4 प्रस्ताव पास हुए थे, नरम दल उन्हें 1907 में वापस लेना या ढीला करना चाहता था।

विभाजन के ऐतिहासिक दुष्परिणाम

  1. राष्ट्रीय आंदोलन का कमजोर होना: ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) की नीति सफल हो गई।

  2. अंग्रेजी हुकूमत का दमन चक्र: अंग्रेजों ने तुरंत गरम दल के नेताओं पर शिकंजा कसा—

    • बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष के लिए मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया।

    • विपिन चंद्र पाल और अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

    • लाला लाजपत राय ब्रिटेन और बाद में अमेरिका चले गए।

  3. 1916 में पुनर्मिलन: यह विभाजन 9 साल तक चला। अंततः 1916 के लखनऊ अधिवेशन में एनी बेसेंट और तिलक के प्रयासों से दोनों धड़े पुन: एक हुए।

3. तुलनात्मक तालिका: नरम दल vs. गरम दल

आधारनरम दल (Moderates)गरम दल (Extremists)
मुख्य नेतादादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहतालाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल
लक्ष्यब्रिटिश छत्रछाया में स्वशासन (Dominion Status)पूर्ण स्वराज (Complete Independence)
कार्यप्रणालीसंवैधानिक तरीके, याचिकाएँ, और प्रार्थना पत्रस्वदेशी, बहिष्कार, सत्याग्रह, और प्रत्यक्ष कार्रवाई
सामाजिक आधारउच्च-मध्यम वर्ग, वकील, और बुद्धिजीवीआम जनता, छात्र, किसान, और युवा वर्ग

Amit Poonia

Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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