काव्य शास्त्र: रस (Rasa – Sentiments and Emotions)
भारतीय काव्यशास्त्र में ‘रस‘ को काव्य की आत्मा माना गया है। आचार्य भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में रस का वर्णन करते हुए लिखा है: “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” अर्थात विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
1. रस के मुख्य अंग (Four Elements of Rasa)
रस के मुख्य रूप से चार अंग होते हैं:
1. स्थायी भाव (Permanent Emotions)
मनुष्य के हृदय में जो भाव जन्म से ही सुप्त (छिपी) अवस्था में हमेशा विद्यमान रहते हैं और उचित अवसर मिलने पर जागृत होते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। इनकी संख्या मुख्य रूप से 11 मानी गई है।
2. विभाव (Causes of Emotion)
स्थायी भावों को जागृत या उद्दीप्त करने वाले कारणों या विषयों को विभाव कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं:
आलंबन विभाव: जिस व्यक्ति या वस्तु के कारण मन में भाव जागे (जैसे- नायक, नायिका या चोर)।
उद्दीपन विभाव: जो वातावरण या चेष्टाएं भाव को और तीव्र करें (जैसे- चांदनी रात, एकांत स्थान, गर्जना)।
3. अनुभाव (Physical Expressions)
स्थायी भाव के जागृत होने पर आश्रय के शरीर में होने वाली शारीरिक चेष्टाओं (Physical Actions) को अनुभाव कहते हैं।
उदाहरण: भय के कारण कांपना, पसीना आना, या क्रोध में आंखें लाल होना।
4. संचारी भाव / व्यभिचारी भाव (Transient Emotions)
मन में स्थायी भाव के साथ-साथ पानी के बुलबुलों की तरह उठने और विलीन होने वाले क्षणिक भावों को संचारी भाव कहते हैं।
इनकी कुल संख्या 33 मानी गई है (जैसे- चिंता, हर्ष, गर्व, मोह, शंका आदि)।
2. हिंदी साहित्य के 11 रस और उनके स्थायी भाव (11 Rasas and Permanent Emotions)
आचार्य भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में 8 रसों का उल्लेख किया था। बाद में आचार्यों ने शांत, वात्सल्य और भक्ति रस को जोड़कर कुल 11 रस स्वीकार किए:
| क्र. सं. | रस का नाम (Rasa) | स्थायी भाव (Permanent Emotion) | उदाहरण / विवरण |
| 1 | शृंगार रस (Shringara) | रति (प्रेम) | जब नायक-नायिका के सौंदर्य और प्रेम का वर्णन हो। |
| 2 | हास्य रस (Hasya) | हास (हंसी) | विचित्र वेशभूषा या बातों से उपजी हंसी। |
| 3 | करुण रस (Karuna) | शोक (दुख) | प्रिय व्यक्ति या वस्तु के विनाश से उत्पन्न दुख। |
| 4 | रौद्र रस (Raudra) | क्रोध | किसी के अपमान या अन्याय से उत्पन्न गुस्सा। |
| 5 | वीर रस (Veera) | उत्साह | युद्ध, दान या धर्म कार्य के लिए मन में जगा उत्साह। |
| 6 | भयानक रस (Bhayanaka) | भय (डर) | हिंसक जीव या डरावनी परिस्थिति देखकर उपजा डर। |
| 7 | बीभत्स रस (Bibhatsa) | जुगुप्सा (घृणा/ग्लानि) | दुर्गंध, खून या सड़ी-गली चीजें देखकर उपजी घृणा। |
| 8 | अद्भुत रस (Adbhuta) | विस्मय (आश्चर्य) | कोई अलौकिक या अनोखी वस्तु देखकर हुआ आश्चर्य। |
| 9 | शांत रस (Shanta) | निर्वेद (उदासीनता/वैराग्य) | ईश्वर भक्ति या संसार की अनित्यता का बोध। |
| 10 | वात्सल्य रस (Vatsalya) | वत्सलता (संतान स्नेह) | छोटे बच्चों के प्रति माता-पिता का निष्पाप प्रेम। |
| 11 | भक्ति रस (Bhakti) | भगवद-विषयक रति | ईश्वर के प्रति परम अनुराग और भक्ति भावना। |
संचारी भाव किसे कहते हैं? (What are Transient Emotions?)
जो भाव मन में स्थायी भाव के साथ-साथ पानी के बुलबुलों की तरह क्षण भर के लिए उठते और खुद ही शांत (विलीन) हो जाते हैं, उन्हें संचारी भाव या व्यभिचारी भाव कहते हैं।
विशेषता: ये किसी एक रस के साथ बंधकर नहीं रहते, बल्कि अनेक रसों में संचरण (विचरण) करते हैं। इसलिए इन्हें ‘व्यभिचारी भाव’ भी कहा जाता है।
33 संचारी भावों की सूची (List of 33 Sanchari Bhavas)
हिंदी काव्यशास्त्र में आचार्य भरतमुनि और अन्य विद्वानों द्वारा स्वीकार किए गए 33 संचारी भाव निम्नलिखित हैं:
निर्वेद (खुद को धिक्कारना या संसार से विरक्ति)
आवेग (घबराहट या उतावलापन)
दैन्य (दीनता या लाचारी)
श्रम (थकावट)
मद (अहंकार या नशा)
जड़ता (अवाक् रह जाना या अचेत होना)
उग्रता (क्रोध या कठोरता)
मोह (अज्ञान या आसक्ति)
विबोध (नींद से जागना या चेतना आना)
स्वप्न (सपने देखना)
अपस्मार (मानसिक रोग या मिर्गी जैसी स्थिति)
गर्वा (घमंड या अभिमान)
मरण (मृत्यु का विचार या अवस्था)
अलसता / आलस्य (सुस्ती या काम न करने की इच्छा)
अमर्ष (विरोधी के प्रति सहन न करने का भाव)
निद्रा (सोना या ऊंघना)
अवहित्था (अपने भावों को छिपाना)
उत्सुक्य / उत्सुकता (प्रतीक्षा या व्याकुलता)
उन्माद (पागलपन)
शंका (संदेह या डर)
स्मृति (पुरानी यादें आना)
मति (बुद्धि या सही निर्णय लेना)
व्याधि (रोग या बीमारी)
संत्रास (अत्यधिक भय या डर)
लज्जा / व्रीड़ा (शर्म या झिझक)
हर्ष (खुशी या प्रसन्नता)
असूया (दूसरों की उन्नति से जलना/ईर्ष्या)
विषेध / विषाद (दुख या निराशा)
धृति (धैर्य या संतोष)
चपलता (अस्थिरता या चंचलता)
ग्लाथि / ग्लानि (पछतावा या मन की कमजोरी)
चिंता (सोच-विचार में डूबना)
वितर्क (तर्क-वितर्क करना या सोच-विचार)
(नोट: बाद के कुछ आचार्यों ने 34वाँ संचारी भाव ‘छल’ (आचार्य देव द्वारा) और 35वाँ ‘चकपकाहट’ भी माना है, परंतु प्रामाणिक रूप से इनकी संख्या 33 ही स्वीकार की जाती है।)
Amit Poonia
Educator & Founder | English Era with Amit Poonia
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