क्रांतिकारी गतिविधि

क्रांतिकारी गतिविधि द्वितीय चरण (1920-1930 का दशक) एवं 1935 का अधिनियम

गांधीजी द्वारा 1922 में असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) को अचानक वापस लेने के बाद युवाओं में भारी निराशा फैली। इसके परिणामस्वरूप भारत में क्रांतिकारी गतिविधि द्वितीय चरण शुरू हुआ, जो अधिक संगठित, समाजवादी विचारधारा से प्रेरित और साहसिक कार्यों से भरा था।

1. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)

  • पृष्ठभूमि: प्रारंभ में 1924 में कानपुर में HRA (Hindustan Republican Association) की स्थापना रामप्रसाद बिस्मिल्लाह, सचिंद्रनाथ सान्याल और योगेश चंद्र चटर्जी द्वारा की गई थी।

  • HSRA का गठन: सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में HRA का नाम बदलकर HSRA (Hindustan Socialist Republican Association) कर दिया गया। यह निर्णय क्रांतिकारी गतिविधि के क्षेत्र में एक बड़ा संगठनात्मक बदलाव था।

  • विचारधारा: भगत सिंह के प्रभाव से इसमें ‘सोशलिस्ट’ (समाजवादी) शब्द जोड़ा गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और समाजवाद पर आधारित एक गणराज्य की स्थापना करना था।

2. प्रमुख क्रांतिकारी और ऐतिहासिक घटनाएं

A. काकोरी ट्रेन कार्रवाई (9 अगस्त 1925)

HRA के वीर सदस्यों ने लखनऊ के पास काकोरी में सरकारी खजाने को ले जा रही ट्रेन को लूटा। इस क्रांतिकारी गतिविधि के तहत चार प्रमुख नायकों (रामप्रसाद बिस्मिल्लाह, अशफाक उल्ला खान, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी) को फांसी दी गई, जबकि चंद्रशेखर आजाद पुलिस को चकमा देने में सफल रहे।

B. सांडर्स वध / लाहौर षड्यंत्र केस (17 दिसंबर 1928)

साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज का बदला लेने के लिए भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद ने लाहौर के सहायक पुलिस अधीक्षक सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना द्वितीय चरण की एक प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधि मानी जाती है।

C. सेंट्रल असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929)

  • उद्देश्य: “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है” — जनता को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि दमनकारी नीतियों का विरोध करना।

  • घटना: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के विरोध में दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में खाली स्थानों पर बम फेंके और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी।

D. लाहौर षड्यंत्र केस और शहादत (23 मार्च 1931)

  • असेंबली बम कांड और सॉन्डर्स वध के मुकदमों को मिलाकर लाहौर षड्यंत्र केस चलाया गया।

  • 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई।

  • इससे पूर्व 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से मुठभेड़ के दौरान चंद्रशेखर आजाद ने स्वयं को गोली मारकर शहादत प्राप्त की। प्रत्येक क्रांतिकारी गतिविधि और ये महान बलिदान इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए।

3. सूर्य सेन और चटगांव शस्त्रागार छापा (18 अप्रैल 1930)

  • नेतृत्व: बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षक सूर्य सेन (जिन्हें प्यार से ‘मास्टर दा’ कहा जाता था) ने इस साहसिक क्रांतिकारी गतिविधि का नेतृत्व किया।

  • संगठन: उन्होंने ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ (IRA) की चटगांव शाखा का गठन किया था। इसमें अनंत सिंह, गणेश घोष, प्रीतिलता वड्डेदार और कल्पना दत्त जैसी निडर महिला क्रांतिकारी भी शामिल थीं।

  • घटना: 18 अप्रैल 1930 की रात को सूर्य सेन और उनके साथियों ने चटगांव (अब बांग्लादेश में) के दो मुख्य ब्रिटिश शस्त्रागारों (Armoury) पर छापा मारकर हथियारों पर कब्जा कर लिया और एक प्रांतीय क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की।

  • जलालाबाद की पहाड़ी का युद्ध: इसके बाद क्रांतिकारियों और ब्रिटिश सेना के बीच जलालाबाद की पहाड़ियों पर भीषण मुठभेड़ हुई, जिसमें कई क्रांतिकारी शहीद हुए।

  • अंजाम: सूर्य सेन को 1933 में गिरफ्तार कर लिया गया और अत्यधिक यातनाएं देने के बाद 12 जनवरी 1934 को फांसी दे दी गई।

4. द्वितीय चरण का मुख्य महत्व (Significance)

  1. वैचारिक परिपक्वता: इस दौर की हर क्रांतिकारी गतिविधि केवल बम-पिस्तौल तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और किसान-मजदूरों के अधिकारों की बात की गई।

  2. जनचेतना: भगत सिंह और सूर्य सेन के बलिदान ने पूरे देश के युवाओं में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की एक प्रचंड लहर पैदा कर दी।

5. 1935 का भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act 1935)

जब देश में हर क्रांतिकारी गतिविधि ब्रिटिश शासन की नींव हिला रही थी और अपने चरम पर थी, उसी दौर में संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही थी। 1935 का भारत सरकार अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साबित हुआ। इसने भारत में प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) का आधार रखा और 1937 के चुनावों का मार्ग प्रशस्त किया।

मुख्य प्रावधान:

  • अखिल भारतीय संघ (All India Federation): ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने का प्रस्ताव रखा गया (हालांकि रियासतों के शामिल न होने के कारण यह प्रावधान लागू नहीं हो सका)।

  • प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy): प्रांतों में 1919 के अधिनियम द्वारा लागू किए गए द्वैध शासन (Dyarchy) को समाप्त कर दिया गया और प्रांतों को स्वायत्त दर्जा दिया गया।

  • केंद्र में द्वैध शासन: प्रांतीय स्तर से द्वैध शासन हटाकर इसे केंद्र स्तर पर लागू करने का प्रावधान किया गया (आरक्षित और हस्तांतरित विषय)।

  • शक्तियों का विभाजन: केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन तीन सूचियों के माध्यम से किया गया:

    1. संघीय सूची (Federal List)

    2. प्रांतीय सूची (Provincial List)

    3. समवर्ती सूची (Concurrent List)

  • संघीय न्यायालय (Federal Court): 1937 में दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई (जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश मॉरिस ग्वायर थे)।

  • सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार: दलित वर्ग, महिलाओं और मजदूरों को भी पृथक निर्वाचन प्रणाली में शामिल किया गया।

6. 1937 के प्रांतीय चुनाव (Provincial Elections of 1937)

1935 के अधिनियम के तहत फरवरी 1937 में 11 प्रांतों में प्रांतीय विधानमंडलों के चुनाव आयोजित किए गए। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण देश में जिस राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था, उसका प्रभाव इन प्रांतीय चुनावों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

  • 11 प्रांत: मद्रास, बॉम्बे, संयुक्त प्रांत (UP), मध्य प्रांत (CP), बिहार, उड़ीसा, असम, बंगाल, पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP)।

चुनाव के परिणाम:

  • कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन:

    • कांग्रेस ने 5 प्रांतों में स्पष्ट (पूर्ण) बहुमत हासिल किया — मद्रास, संयुक्त प्रांत (UP), मध्य प्रांत (CP), बिहार और उड़ीसा।

    • 3 अन्य प्रांतों (बॉम्बे, असम और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत) में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और बाद में गठबंधन सरकारें बनाईं।

    • कुल मिलाकर 11 में से 8 प्रांतों में कांग्रेस ने अपनी सरकारें (मंत्रिमंडल) गठित कीं।

  • मुस्लिम लीग का प्रदर्शन:

    • मुस्लिम लीग को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी करारी हार का सामना करना पड़ा। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी और बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी ने सरकार बनाई।

7. 1937 के प्रांतीय मंत्रिमंडलों का कार्यकाल एवं इस्तीफा

  • 28 महीने का शासन: कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने लगभग 28 महीनों तक शासन किया और शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार तथा नागरिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

  • अक्टूबर 1939 में इस्तीफा:

    • सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) शुरू हो गया।

    • तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलितगो ने भारतीय नेताओं और प्रांतीय सरकारों से परामर्श किए बिना ही भारत को युद्ध में शामिल घोषित कर दिया।

    • इसके विरोध में 22 अक्टूबर 1939 को सभी 8 प्रांतों के कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने एक साथ त्यागपत्र (इस्तीफा) दे दिया।

  • मुक्ति दिवस (Deliverance Day): कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र देने पर 22 दिसंबर 1939 को मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने बी.आर. अंबेडकर के साथ मिलकर ‘मुक्ति दिवस’ मनाया।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी गतिविधियों का द्वितीय चरण और 1935 का भारत सरकार अधिनियम बेहद निर्णायक मोड़ साबित हुए।

जहाँ एक ओर HSRA (भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद) और सूर्य सेन (चटगांव शस्त्रागार) जैसे महान सेनानियों की प्रत्येक क्रांतिकारी गतिविधि ने अपनी वैचारिक परिपक्वता, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान से देश के युवाओं में राष्ट्रीयता की प्रचंड ज्वाला प्रज्वलित की, वहीं दूसरी ओर 1935 के अधिनियम के तहत हुए 1937 के प्रांतीय चुनावों ने भारतीयों को शासन-संचालन और संवैधानिक प्रक्रियाओं का व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया।

संक्षेप में कहें तो, इन साहसिक क्रांतिकारी गतिविधियों और वीर शहीदों के बलिदान ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी, जबकि प्रांतीय स्वायत्तता ने यह साबित कर दिया कि भारतीय अपना शासन खुद चलाने में पूरी तरह सक्षम हैं। इन दोनों धाराओं के सम्मिलित प्रभाव ने भारत को 1947 की अंतिम स्वतंत्रता की ओर तीव्र गति से अग्रसर किया।

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