सत्याग्रह

1. गांधी जी का भारत आगमन एवं पृष्ठभूमि और सत्याग्रह (1915-1916)

  • दक्षिण अफ्रीका का अनुभव: गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्षों तक रहे, जहाँ उन्होंने नस्लभेद (Apartheid) और अन्याय के खिलाफ सत्याग्रह, अहिंसा और सविनय अवज्ञा के हथियारों का सफल प्रयोग किया था।

  • 9 जनवरी 1915: जब वे मुंबई के ‘अपोलो बंदरगाह’ पर उतरे, तो वे भारत में एक अपरिचित नाम नहीं थे, बल्कि एक स्थापित राजनीतिक नेता के रूप में जाने जाते थे।

  • गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह: अपने राजनीतिक गुरु गोखले के कहने पर गांधी जी ने तय किया कि वे एक वर्ष तक किसी भी राजनीतिक मुद्दे पर सीधे टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने भारत के गाँवों, किसानों की स्थिति और आम जनता के जीवन को समझने के लिए पूरे देश की यात्रा की।

  • साबरमती आश्रम की स्थापना: 1915 में अहमदाबाद के कोचरब में उन्होंने आश्रम स्थापित किया, जिसे बाद में 1917 में साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित कर दिया गया। यह आश्रम सत्याग्रह के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का केंद्र बना।

2. चंपारण सत्याग्रह (1917) – भारत में पहला सविनय अवज्ञा (First Civil Disobedience)

📌 विस्तृत पृष्ठभूमि (Detailed Background)

बिहार के चंपारण जिले में यूरोपीय (अंग्रेज) बागान मालिकों ने किसानों पर ‘तिनकटिया प्रथा’ (Tinkathia System) थोप रखी थी। इसके तहत हर किसान को अपनी कुल ज़मीन के $\frac{3}{20}$ भाग (20 कट्ठा में से 3 कट्ठा) पर अनिवार्य रूप से नील (Indigo) की खेती करनी पड़ती थी।

19वीं सदी के अंत में जर्मनी में रासायनिक (सिंथेटिक) रंगों की खोज हो गई, जिससे बाज़ार में प्राकृतिक नील की माँग गिर गई। अंग्रेज बागान मालिक नील के व्यवसाय से हटना चाहते थे, लेकिन वे इसका पूरा नुकसान किसानों पर डाल रहे थे। उन्होंने किसानों को अनुबंध से मुक्त करने के बदले भारी लगान, तावान (हर्जाना) और अवैध उपकर (Cesses) वसूलना शुरू कर दिया।

📌 गांधी जी का आगमन और घटनाक्रम

  • राजकुमार शुक्ला का प्रयास: 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में चंपारण के एक स्थानीय किसान राजकुमार शुक्ला ने गांधी जी से मुलाकात की और उन्हें चंपारण के किसानों का दर्द देखने के लिए आमंत्रित किया।

  • कानून का उल्लंघन (सविनय अवज्ञा): अप्रैल 1917 में जब गांधी जी चंपारण पहुँचे, तो स्थानीय मजिस्ट्रेट ने उन्हें तुरंत जिला छोड़ने का सरकारी आदेश दिया। गांधी जी ने इस अन्यायपूर्ण आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि वे सजा भुगतने को तैयार हैं। भारत की धरती पर कानून का यह पहला अहिंसक उल्लंघन ‘सविनय अवज्ञा’ का पहला प्रयोग था।

  • चंपारण कृषि समिति (Champaran Agrarian Committee): गांधी जी के कड़े रुख और जन-समर्थन को देखकर सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने मामले की जाँच के लिए एक समिति बनाई, जिसमें गांधी जी को भी सदस्य बनाया गया।

📌 परिणाम और महत्व

गांधी जी ने ठोस आँकड़ों और हज़ारों किसानों के बयानों के आधार पर साबित कर दिया कि बागान मालिक अवैध वसूली कर रहे थे। अंततः:

  1. तिनकटिया प्रणाली को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया।

  2. बागान मालिकों को अवैध रूप से वसूली गई रकम का 25% हिस्सा किसानों को लौटाना पड़ा।

  3. कुछ ही वर्षों में अंग्रेज बागान मालिक चंपारण छोड़कर चले गए।

  4. इसी सफलता से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी।

3. अहमदाबाद मिल हड़ताल (मार्च 1918) – भारत में पहली भूख हड़ताल (First Hunger Strike)

📌 विस्तृत पृष्ठभूमि (Detailed Background)

1917 के अंत में अहमदाबाद में ‘प्लेग’ की महामारी फैली थी। मज़दूर शहर छोड़कर भाग रहे थे, इसलिए सूती वस्त्र मिल मालिकों ने उन्हें रोकने के लिए उनके मूल वेतन का 75% तक ‘प्लेग बोनस’ देना शुरू किया।

मार्च 1918 में जब महामारी खत्म हुई, तो मिल मालिकों ने अचानक यह बोनस पूरी तरह बंद कर दिया। दूसरी ओर, प्रथम विश्व युद्ध के कारण खाद्य पदार्थों और कपड़ों की कीमतें आसमान छू रही थीं। मज़दूरों की माँग थी कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए बोनस बंद करने के बजाय कम से कम 50% वेतन वृद्धि (Dearness Allowance) दी जाए।

📌 गांधी जी का हस्तक्षेप और भूख हड़ताल

  • मध्यस्थता: मिल मालिक अंबालाल साराभाई और मज़दूरों के बीच गतिरोध बढ़ गया। गांधी जी ने मामले का वैज्ञानिक अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि मज़दूरों को 50% नहीं, बल्कि 35% की वेतन वृद्धि मिलनी चाहिए जो बिल्कुल न्यायसंगत है।

  • अंसुया बेन की भूमिका: मिल मालिक अंबालाल साराभाई की बहन अंसुया बेन ने अपने भाई के खिलाफ जाकर मज़दूरों का साथ दिया और गांधी जी को आमंत्रित किया।

  • भारत में पहली भूख हड़ताल: जब हड़ताल लंबी खिंचने लगी और गरीब मज़दूर आर्थिक तंगी के कारण काम पर लौटने लगे, तो गांधी जी ने घोषणा की कि जब तक मज़दूरों को उनका हक नहीं मिलता, वे स्वयं अन्न-जल त्याग देंगे।

📌 परिणाम और महत्व

गांधी जी के अनशन के तीसरे ही दिन मिल मालिकों पर नैतिक दबाव पड़ा और वे समझौते के लिए तैयार हो गए।

  • मामला एक मध्यस्थ ट्रिब्यूनल (Arbitrator) को सौंपा गया।

  • ट्रिब्यूनल ने गांधी जी की गणना को सही मानते हुए मज़दूरों को 35% वेतन वृद्धि देने का फैसला सुनाया।

4. खेड़ा सत्याग्रह (मार्च-मई 1918) – भारत में पहला असहयोग (First Non-Cooperation)

📌 विस्तृत पृष्ठभूमि (Detailed Background)

गुजरात के खेड़ा जिले में 1918 में भारी बारिश और प्लेग के कारण किसानों की फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई थीं।

ब्रिटिश सरकार के राजस्व नियम (Revenue Code) के अनुसार:

यदि किसी वर्ष प्राकृतिक आपदा के कारण कुल उपज सामान्य वर्ष की उपज के $\frac{1}{4}$ (25%) से भी कम हो, तो किसानों का लगान (Tax) पूरी तरह माफ कर दिया जाना चाहिए।

किसानों के अनुसार फसल की बर्बादी 75% से अधिक थी, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने झूठे सर्वेक्षण करवाकर दावा किया कि फसल ठीक हुई है और किसानों से जबरन पूरा लगान वसूलना शुरू कर दिया।

📌 सत्याग्रह का संचालन

  • लगान न देने का संकल्प: गांधी जी ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के सदस्यों के साथ जाकर खुद गाँव-गाँव स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद उन्होंने किसानों से लगान न देने (No-Tax Campaign) की अपील की और कहा कि भले ही उनकी ज़मीनें ज़ब्त कर ली जाएँ, वे अन्याय के आगे नहीं झुकेंगे।

  • सरदार पटेल का उदय: इस आंदोलन के दौरान एक युवा वकील वल्लभभाई पटेल अपनी वकालत छोड़कर गांधी जी के साथ जुड़े। उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर किसानों को संगठित किया।

  • अहिंसक प्रतिरोध: जब सरकारी अधिकारी किसानों के मवेशी, ज़मीन और सामान ज़ब्त करने आते, तो किसान बिना किसी हिंसा के केवल उनका असहयोग करते थे।

📌 परिणाम और महत्व

आंदोलन के बढ़ते दबाव को देखकर ब्रिटिश सरकार ने गुप्त आदेश (Confidential Instructions) जारी किए।

  • सरकार ने अधिकारियों से कहा कि लगान केवल उन्हीं किसानों से वसूला जाए जो स्वेच्छा से दे सकते हैं।

  • गरीब और प्रभावित किसानों का लगान माफ कर दिया गया तथा ज़ब्त की गई ज़मीनें और मवेशी वापस लौटा दिए गए।

📝 तीनों प्रयोगों का एकीकृत निष्कर्ष 

  1. सत्याग्रह की त्रिवेणी (Trio of Methods):

    • चंपारण: सविनय अवज्ञा (अनदेखा करना और सजा भुगतना)

    • अहमदाबाद: भूख हड़ताल (नैतिक दबाव और आत्म-पीड़ना)

    • खेड़ा: असहयोग (अनन्यायपूर्ण कर देने से इनकार)

  2. राष्ट्रीय आंदोलन का व्यवसायीकरण से जन-आंदोलन में बदलना: गांधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम को केवल बड़े शहरों की अदालतों से निकालकर गाँव के खेतों, सूती मिलों और झोपड़ियों तक पहुँचा दिया।

  3. गांधीवादी नेताओं की नई टीम: इन तीन क्षेत्रीय संघर्षों ने भारत को ऐसे समर्पित नेता दिए जिन्होंने आगे जाकर पूरे देश की कमान संभाली—डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, जे.बी. कृपलानी और महादेव देसाई।

Amit Poonia

Founder & Educator | English Era With Amit Poonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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