द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव

द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर ऐतिहासिक असर

द्वितीय विश्व युद्ध ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक निर्णायक मोड़ दिया। 1939 में बिना परामर्श भारत को युद्ध में शामिल करने पर कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद अगस्त प्रस्ताव, व्यक्तिगत सत्याग्रह और क्रिप्स मिशन की विफलता ने ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोर स्थिति को उजागर किया। इस असंतोष ने आगे चलकर 1942 के ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

1. द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव: कांग्रेस मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र (1939) और मुक्ति दिवस

(a) पृष्ठभूमि और युद्ध की घोषणा

1 सितंबर 1939 को जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण करने के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव भारतीय राजनीति पर तुरंत दिखाई देने लगा।

3 सितंबर 1939 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिखितगो ने भारतीय विधानमंडल, प्रांतीय सरकारों या भारतीय नेताओं से बिना कोई परामर्श किए केवल एक एकतरफा घोषणा के जरिए भारत को युद्ध में मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस आदि) की ओर से शामिल घोषित कर दिया।

(b) कांग्रेस का रुख और माँगे

कांग्रेस का मानना था कि एक गुलाम देश दूसरे देशों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कैसे लड़ सकता है? द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव ऐसा था कि सितंबर 1939 में वर्धा में हुई ‘कांग्रेस कार्यसमिति’ की बैठक में निर्णय लिया गया कि:

  • भारत युद्ध के प्रयासों में ब्रिटेन का समर्थन करेगा, लेकिन केवल एक शर्त पर—यदि ब्रिटिश सरकार यह सार्वजनिक घोषणा करे कि युद्ध के बाद भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाएगी।

  • युद्ध काल के दौरान केंद्र में एक वास्तविक जिम्मेदार सरकार (National Government) गठित की जाएगी।

वायसराय लिनलिखितगो ने कांग्रेस की इन माँगों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया और कहा कि युद्ध समाप्त होने से पहले किसी भी संवैधानिक सुधार पर विचार नहीं किया जा सकता।

(c) कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा (28–29 अक्टूबर 1939)

ब्रिटिश सरकार के अडिग और तानाशाही रवैये के विरोध में कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने सभी प्रांतीय मंत्रिमंडलों को पद से इस्तीफा देने का निर्देश दिया। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव प्रांतीय सरकारों की स्थिरता पर भी पड़ा।

1937 के प्रांतीय चुनावों के तहत कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों (मद्रास, बॉम्बे, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, ओडिशा, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और असम) में सरकारें बनाई थीं।

28-29 अक्टूबर 1939 को इन सभी 8 प्रांतीय कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।

(d) ‘मुक्ति दिवस’ (Day of Deliverance – 22 दिसंबर 1939)

  • मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया: कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे को मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने एक बड़े अवसर के रूप में देखा। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में मुसलमानों के अधिकारों का हनन हुआ था।

  • जिन्ना ने भारत भर के मुसलमानों से 22 दिसंबर 1939 (शुक्रवार) को “मुक्ति दिवस” (Deliverance Day / Day of Deliverance) के रूप में मनाने का आह्वान किया।

  • अन्य दलों का समर्थन: डॉ. बी. आर. अम्बेडकर और उनकी ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ (Independent Labour Party) ने भी कांग्रेस के इस्तीफे का स्वागत किया और इस ‘मुक्ति दिवस’ के आयोजन में मुस्लिम लीग का साथ दिया।

2. अगस्त प्रस्ताव (1940) एवं व्यक्तिगत सत्याग्रह

(a) अगस्त प्रस्ताव (August Offer – 8 अगस्त 1940)

पृष्ठभूमि:

1940 के मध्य तक युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी। मई-जून 1940 में फ्रांस का पतन हो गया और ब्रिटेन पर जर्मन हवाई हमलों का खतरा मंडराने लगा। वैश्विक स्तर पर द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव गहराने लगा, जिससे भारत के जन-धन और सैन्य सहयोग की अति-आवश्यकता को देखते हुए वायसराय लॉर्ड लिनलिखितगो ने 8 अगस्त 1940 को एक संवैधानिक प्रस्ताव रखा, जिसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ कहा जाता है।

प्रमुख प्रावधान:

  1. डोमिनियन स्टेटस: युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को ‘डोमिनियन स्टेटस’ (अधिराज्य का दर्जा) दिया जाएगा।

  2. संविधान सभा का गठन: युद्ध के पश्चात् मुख्यतः भारतीयों से निर्मित एक प्रतिनिधि संस्था (संविधान सभा) का गठन किया जाएगा जो भारत का नया संविधान बनाएगी।

  3. वायसराय की परिषद का विस्तार: वायसराय की कार्यकारिणी परिषद (Executive Council) का तत्काल विस्तार किया जाएगा जिसमें अधिक संख्या में भारतीयों को शामिल किया जाएगा।

  4. अल्पसंख्यकों को वीटो (Veto) शक्ति: प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया कि ब्रिटिश सरकार ऐसा कोई भी संविधान या शासन व्यवस्था किसी भी वर्ग (अल्पसंख्यक) पर जबरन नहीं थोपेगी, जिसका वह विरोध करते हों।

विफलता का कारण:

  • कांग्रेस का विरोध: जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट रूप से कहा कि “डोमिनियन स्टेटस का विचार अब पूरी तरह से मृत (Dead as a doornail) हो चुका है।” कांग्रेस अब केवल पूर्ण स्वतंत्रता (Complete Independence) चाहती थी।

  • मुस्लिम लीग का विरोध: लीग ने इसे इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें अलग ‘पाकिस्तान’ के निर्माण की स्पष्ट गारंटी नहीं थी, यद्यपि उन्हें वीटो शक्ति मिलने पर संतोष था।

(b) व्यक्तिगत सत्याग्रह (Individual Satyagraha – 1940)

उद्देश्य और रणनीति:

अगस्त प्रस्ताव के विफल होने के बाद, महात्मा गांधी ने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक नया रास्ता निकाला। गांधी जी उस समय ब्रिटेन की नाजुक स्थिति का अनुचित लाभ उठाकर व्यापक हिंसात्मक या जन-आंदोलन शुरू नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाने के बजाय ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ शुरू करने का फैसला किया। भारत में द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव सीमित प्रतिरोध के रूप में प्रकट हुआ।

इसके मुख्य उद्देश्य थे:

  • यह साबित करना कि भारतवासी युद्ध का स्वेच्छा से समर्थन नहीं कर रहे हैं।

  • भाषण देने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का दावा करना।

सत्याग्रह की कार्यप्रणाली:

  1. गांधी जी स्वयं सत्याग्रही का चयन करते थे।

  2. चुना गया सत्याग्रही किसी सार्वजनिक स्थान पर जाकर युद्ध के खिलाफ भाषण देता था (जैसे: “युद्ध में किसी भी रूप में मदद न करना ही मानवता की सेवा है”)।

  3. भाषण देने के बाद सत्याग्रही स्वयं अपनी गिरफ्तारी देता था। यदि पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं करती थी, तो वह गाँव-गाँव भाषण देते हुए दिल्ली की ओर पैदल मार्च शुरू कर देता था।

प्रमुख सत्याग्रही:

  • प्रथम सत्याग्रही: आचार्य विनोबा भावे (इन्होंने 17 अक्टूबर 1940 को पवनार आश्रम, महाराष्ट्र से सत्याग्रह शुरू किया)।

  • द्वितीय सत्याग्रही: पंडित जवाहरलाल नेहरू।

  • तृतीय सत्याग्रही: ब्रह्मदत्त।

‘दिल्ली चलो आंदोलन’:

सत्याग्रहियों के दिल्ली की ओर प्रस्थान करने की रणनीति के कारण ही व्यक्तिगत सत्याग्रह को “दिल्ली चलो आंदोलन” के नाम से भी जाना गया। मई 1941 तक लगभग 25,000 से अधिक सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया जा चुका था।

3. क्रिप्स मिशन (1942): असफलता और ‘उत्तर-दिनांकित चेक’

(a) पृष्ठभूमि

  • जापानी आक्रमण का खतरा: दिसंबर 1941 में जापान द्वितीय विश्व युद्ध में कूद पड़ा और उसने तेजी से दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करना शुरू किया। जब मार्च 1942 में जापान ने रंगून (बर्मा) पर कब्जा कर लिया, तो भारत की पूर्वी सीमाओं पर सीधे द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव दिखने लगा और आक्रमण का खतरा मंडराने लगा।

  • अंतरराष्ट्रीय दबाव: अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट, चीन के राष्ट्रपति च्यांग काई-शेक और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल पर दबाव बनाया कि वे भारत के राजनीतिक गतिरोध को दूर करें और भारतीय जनमानस का पूर्ण सहयोग प्राप्त करें।

(b) क्रिप्स मिशन का आगमन

ब्रिटिश सरकार ने अपने कैबिनेट मंत्री सर स्टैफोर्ड क्रिप्स (जो भारतीय नेताओं के मित्र माने जाते थे) के नेतृत्व में एक मिशन 22 मार्च 1942 को भारत भेजा।

(c) क्रिप्स प्रस्ताव की मुख्य शर्तें

  1. डोमिनियन स्टेटस: युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत ‘डोमिनियन स्टेटस’ का दर्जा दिया जाएगा।

  2. संविधान सभा: युद्ध के तुरंत बाद एक संविधान सभा का गठन किया जाएगा। इसके सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से चुने जाएँगे और देसी रियासतों के प्रतिनिधियों को राजाओं द्वारा नामांकित किया जाएगा।

  3. प्रांतों को पृथक होने का अधिकार (Option to Exit / Secession clause): यदि कोई प्रांत या देसी रियासत नए संविधान से सहमत न हो, तो उसे भारतीय संघ से अलग रहने और अपना पृथक संविधान बनाने का अधिकार होगा।

  4. रक्षा का दायित्व: जब तक नया संविधान लागू नहीं हो जाता, तब तक भारत की रक्षा और सैन्य नियंत्रण पूरी तरह से ब्रिटेन के हाथों में ही रहेगा।

(d) क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण

  • कांग्रेस द्वारा विरोध:

    • कांग्रेस ने ‘डोमिनियन स्टेटस’ को पूरी तरह खारिज किया और तत्कालीन ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ एवं एक जिम्मेदार राष्ट्रीय सरकार की मांग की।

    • प्रांतों के अलग होने के प्रावधान (Secession clause) को कांग्रेस ने “भारत के टुकड़ों में विभाजन की साजिश” माना।

    • देसी रियासतों के प्रतिनिधियों को जनता द्वारा चुने जाने के बजाय राजाओं द्वारा नामांकित करने पर भी आपत्ति जताई गई।

  • मुस्लिम लीग द्वारा विरोध:

    • मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें अलग ‘पाकिस्तान’ की सीधी और स्पष्ट मांग को स्वीकार नहीं किया गया था, यद्यपि प्रांतों के अलग होने का प्रावधान इसके अप्रत्यक्ष द्वार खोलता था।

  • अन्य राजनीतिक दल: सिख समुदाय ने प्रांतों को अलग होने का अधिकार देने का विरोध किया, क्योंकि इससे पंजाब का विभाजन तय था। वहीं दलित वर्ग ने अपने राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा की स्पष्ट व्यवस्था न होने के कारण इसे खारिज कर दिया।

(e) ‘उत्तर-दिनांकित चेक’ (Post-dated Cheque)

  • महात्मा गांधी की टिप्पणी: महात्मा गांधी ने क्रिप्स मिशन के भावी (भविष्य के) वादों को खारिज करते हुए इसे “एक उत्तर-दिनांकित चेक” (A Post-dated Cheque) कहा।

  • पंडित नेहरू का संशोधन: बाद में इस कथन में यह जोड़ दिया गया कि यह “एक टूटते/डूबते हुए बैंक का उत्तर-दिनांकित चेक” (A Post-dated Cheque on a Crashing/Failing Bank) है।

  • इसका तात्पर्य यह था कि जो ब्रिटिश साम्राज्य स्वयं युद्ध में ध्वस्त हो रहा है और जिस पर द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव विनाशकारी रहा है, वह भविष्य में स्वतंत्रता देने का वादा कैसे कर सकता है?

(f) ऐतिहासिक परिणाम

क्रिप्स मिशन की असफलता ने भारतीय नेताओं और जनता को यह पूरी तरह समझा दिया कि ब्रिटिश सरकार स्वेच्छा से सत्ता हस्तांतरित नहीं करना चाहती। इस तरह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव निर्णायक साबित हुआ, जिसने अगस्त 1942 में महात्मा गांधी को अपने सबसे बड़े और अंतिम जन-आंदोलन—’भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement)—का आह्वान करने के लिए प्रेरित किया।

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहें तो, द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदलने वाला एक क्रांतिकारी मोड़ साबित हुआ। इसने ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की गति को तेज कर दिया और भारतीयों में पूर्ण स्वराज हासिल करने की भावना को अंतिम रूप से प्रज्वलित कर दिया।

Amit Poonia

Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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