भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1929–1932): विस्तृत व्याख्या
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1929 से 1932 तक का समय अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ था। इस दौरान कांग्रेस ने अपना अंतिम लक्ष्य ‘पूर्ण स्वराज’ तय किया, महात्मा गांधी ने विशाल जनांदोलन चलाया और भारत के भावी सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को लेकर बड़े फैसले हुए।
1. पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव (1929) – लाहौर अधिवेशन
पृष्ठभूमि (Background):
1928 में पंडित मोतीलाल नेहरू द्वारा तैयार की गई ‘नेहरू रिपोर्ट’ में अंग्रेजों से डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज्य) की मांग की गई थी। इसके लिए अंग्रेजों को 1 वर्ष का समय दिया गया था। जब ब्रिटिश सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता का रास्ता चुना।
लाहौर अधिवेशन के मुख्य बिंदु:
अध्यक्षता: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस ऐतिहासिक अधिवेशन की अध्यक्षता की।
पूर्ण स्वराज की घोषणा: दिसंबर 1929 में लाहौर में रावी नदी के तट पर हुए अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।
तिरंगा फहराना: 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को जवाहरलाल नेहरू ने इंकलाब जिंदाबाद के नारों के बीच रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का नया तिरंगा झंडा फहराया।
पहला स्वाधीनता दिवस: यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहला ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ (स्वतंत्रता दिवस) मनाया जाएगा। (इसी ऐतिहासिक तिथि को यादगार बनाए रखने के लिए 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया था)।
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement: 1930–1934)
लाहौर अधिवेशन में ही महात्मा गांधी को अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार दिया गया। गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने 11 मांगें रखीं, जिन्हें खारिज कर दिए जाने के बाद आंदोलन शुरू हुआ।
(i) दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)
नमक को ही क्यों चुना?: नमक समाज के हर वर्ग (अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम) की बुनियादी जरूरत था। ब्रिटिश सरकार ने नमक पर भारी कर (Tax) लगाया था और इसके निर्माण पर एकाधिकार कर रखा था।
यात्रा का विवरण: 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 चुने हुए अनुयायियों के साथ अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से गुजरात के दांडी तट तक 240 मील (लगभग 385 किमी) की पदयात्रा शुरू की।
कानून का उल्लंघन: 24 दिनों की यात्रा के बाद 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर गांधीजी ने मुट्ठी भर नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को तोड़ा। इसके साथ ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन फैल गया।
(ii) गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)
गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ एक ऐतिहासिक राजनीतिक समझौता था।
यह समझौता लंदन में आयोजित होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) से ठीक पहले दिल्ली में हुआ था, इसलिए इसे ‘दिल्ली समझौता’ (Delhi Pact) भी कहा जाता है।
समझौते की पृष्ठभूमि (Background)
1930 में महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा करके ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ (Civil Disobedience Movement) शुरू किया था। देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश में प्रचंड रूप से फैल गया।
अंग्रेजी सरकार के कर वसूलने के तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब अंग्रेजों को एहसास हुआ कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधीजी के सहयोग के बिना भारत में कोई भी संवैधानिक सुधार सफल नहीं हो सकता, तब वायसराय लॉर्ड इरविन ने गांधीजी को बातचीत के लिए आमंत्रित किया।
समझौते की मुख्य शर्तें (Key Points / Provisions)
इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने निम्नलिखित शर्तें स्वीकार की थीं:
1. ब्रिटिश सरकार (लॉर्ड इरविन) द्वारा स्वीकार की गई बातें:
राजनीतिक बंदियों की रिहाइ: हिंसा में शामिल न होने वाले सभी राजनीतिक बंदियों को तुरंत रिहा किया जाएगा।
संपत्ति की वापसी: आंदोलन के दौरान जब्त की गई सभी जमीनों और संपत्तियों को वापस किया जाएगा।
नमक बनाने का अधिकार: समुद्र तट के किनारे रहने वाले लोगों को बिना किसी टैक्स के अपने उपभोग के लिए नमक बनाने और बेचने का अधिकार दिया जाएगा।
शांतिपूर्ण धरना का अधिकार: शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध/धरना देने की अनुमति दी जाएगी।
जुर्माने की माफी: जो जुर्माने अभी तक वसूल नहीं किए गए हैं, उन्हें माफ कर दिया जाएगा।
2. कांग्रेस (महात्मा गांधी) द्वारा स्वीकार की गई बातें:
आंदोलन का स्थगन: सविनय अवज्ञा आंदोलन को तुरंत प्रभाव से रोक/स्थगित कर दिया जाएगा।
गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी: कांग्रेस लंदन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमत हुई।
ब्रिटिश सामान का बहिष्कार बंद: अंग्रेजी सामानों और संस्थाओं के बहिष्कार की मांग को वापस लिया जाएगा।
समझौते का महत्व और आलोचना
महत्व: इतिहास में पहली बार ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी को बराबरी (Equal Status) के स्तर पर बैठाकर बातचीत की थी।
आलोचना: इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना यह कहकर की जाती है कि गांधीजी इसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को टालने या माफ करवाने में असफल रहे थे (गांधी-इरविन समझौते के मात्र 18 दिन बाद, 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई थी)।
(iii) गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences)
गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच आयोजित तीन प्रमुख सम्मेलनों (बैठकों) की एक श्रृंखला थी।
यह बैठकें 1930 से 1932 के बीच लंदन में आयोजित की गई थीं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत में भावी संवैधानिक सुधारों और स्वतंत्रता/स्वशासन (Self-governance) की मांगों पर विचार-विमर्श करना था।
1. गोलमेज सम्मेलन का पृष्ठभूमि और उद्देश्य (Background & Purpose)
साइमन कमीशन की रिपोर्ट: 1928 में भारत आए ‘साइमन कमीशन’ की रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक दलों के नेताओं को लंदन बुलाया।
समान दर्जा (Round Table Format): इसे “गोलमेज” (गोल मेज/Round Table) इसलिए कहा गया क्योंकि गोल मेज पर बैठने से सभी प्रतिभागियों को समान दर्जा (Equal Status) मिलता है। इसमें अंग्रेजों और भारतीयों को एक बराबर रखकर चर्चा करने का दिखावा किया गया था।
पूर्ण स्वराज और जनांदोलन: उस समय भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ (Civil Disobedience Movement) अपने चरम पर था और भारत ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग कर रहा था।
2. तीनों गोलमेज सम्मेलनों का विवरण (Details of the 3 Conferences)
(i) प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 – जनवरी 1931)
स्थिति: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण इसका बहिष्कार किया।
प्रतिभागी: मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, दलित वर्ग (डॉ. बी.आर. आंबेडकर) और देशी रियासतों के राजाओं ने भाग लिया।
परिणाम: कांग्रेस के बिना कोई भी निर्णय लेना संभव नहीं था, इसलिए यह सम्मेलन विफल रहा।
(ii) द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर 1931 – दिसंबर 1931)
स्थिति: ‘गांधी-इरविन समझौते (1931)’ के बाद महात्मा गांधी सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करके इसमें भाग लेने लंदन गए।
प्रतिनिधि: गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में ‘एस.एस. राजपुताना’ जहाज से लंदन पहुंचे।
विवाद व विफलता: सम्मेलन में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और दलितों के लिए ‘पृथक निर्वाचिका’ (Separate Electorate) के मुद्दे पर गहरा मतभेद हो गया। गांधीजी खाली हाथ भारत लौटे और उन्होंने आंदोलन फिर से शुरू कर दिया।
(iii) तृतीय गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1932 – दिसंबर 1932)
स्थिति: कांग्रेस ने एक बार फिर इसका बहिष्कार किया। ब्रिटेन के लेबर पार्टी के नेताओं ने भी इसमें भाग नहीं लिया।
परिणाम: इसमें बहुत कम प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
3. गोलमेज सम्मेलनों का मुख्य परिणाम (Outcome)
तीनों सम्मेलनों के निष्कर्ष के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में एक ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) जारी किया।
इसी श्वेत पत्र के आधार पर आगे चलकर भारत शासन अधिनियम 1935 (Government of India Act 1935) पारित किया गया, जिसने स्वतंत्र भारत के संविधान का ढांचा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
📌 महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु (Key Facts for Competitive Exams)
तीनों सम्मेलनों में भाग लेने वाले नेता: डॉ. बी.आर. आंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था।
कांग्रेस की भागीदारी: कांग्रेस ने केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था (प्रतिनिधि: महात्मा गांधी)।
महिला प्रतिनिधि: सरोजिनी नायडू ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया था।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री: तीनों सम्मेलनों के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैमसे मैक्डोनाल्ड (Ramsay MacDonald) थे।
3. कम्यूनल अवॉर्ड (1932) एवं पूना पैक्ट
(i) कम्यूनल अवॉर्ड (सांप्रदायिक पंचाट – 16 अगस्त 1932)
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैक्डोनाल्ड ने ‘कम्यूनल अवॉर्ड’ की घोषणा की।
इसके तहत मुस्लिम, सिख और ईसाइयों के साथ-साथ दलित वर्ग (Depressed Classes) को भी ‘पृथक निर्वाचिका’ (Separate Electorate) प्रदान कर दी गई।
गांधीजी का विरोध: गांधीजी का मानना था कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका से हिंदू समाज हमेशा के लिए विभाजित हो जाएगा और अस्पृश्यता (Untouchability) मिटाने के प्रयास विफल हो जाएंगे।
(ii) पूना पैक्ट (Poona Pact – 24 सितंबर 1932)
पूना पैक्ट (Poona Pact) 24 सितंबर 1932 को पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के प्रतिनिधियों के बीच हुआ एक ऐतिहासिक समझौता था।
यह समझौता मुख्य रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दलित वर्ग (डिप्रेस्ड क्लासेस) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनके अधिकारों से संबंधित था।
पूना पैक्ट की पृष्ठभूमि (Background)
कम्यूनल अवॉर्ड (सांप्रदायिक पंचाट – 16 अगस्त 1932):
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैक्डोनाल्ड ने ‘कम्यूनल अवॉर्ड’ की घोषणा की थी।
इसके तहत मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों की तरह दलित वर्ग को भी ‘पृथक निर्वाचिका’ (Separate Electorate) का अधिकार दे दिया गया।
पृथक निर्वाचिका का अर्थ: दलित वर्ग के प्रतिनिधि का चुनाव केवल दलित मतदाता ही करेंगे।
गांधीजी का विरोध और आमरण अनशन:
महात्मा गांधी इस निर्णय के कड़े खिलाफ थे। उनका मानना था कि दलितों को अलग निर्वाचिका देने से हिंदू समाज हमेशा के लिए विभाजित हो जाएगा और अस्पृश्यता (छुआछूत) मिटाने के प्रयास विफल हो जाएंगे।
इसके विरोध में गांधीजी ने 20 सितंबर 1932 को पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन (Fast unto death) शुरू कर दिया।
नेताओं की मध्यस्थता:
गांधीजी के बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचारी जैसे प्रमुख नेताओं ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर और गांधीजी के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत शुरू करवाई।
पूना पैक्ट की मुख्य शर्तें (Key Provisions)
पृथक निर्वाचिका का त्याग: डॉ. आंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग वापस ले ली।
आरक्षित सीटों में वृद्धि: इसके बदले में प्रांतीय विधानमंडलों (Provincial Legislatures) में दलित वर्ग के लिए आरक्षित (Reserved) सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गई।
केंद्रीय विधानमंडल में आरक्षण: केंद्रीय विधानमंडल (Central Legislature) में भी दलितों के लिए 18% सीटें आरक्षित की गईं।
संयुक्त निर्वाचिका (Joint Electorate): यह तय हुआ कि दलित प्रतिनिधियों का चुनाव संयुक्त निर्वाचिका के तहत होगा, जिसमें सभी जातियों के लोग मतदान करेंगे, लेकिन उम्मीदवार दलित वर्ग का ही होगा।
पूना पैक्ट का महत्व (Significance)
हिंदू समाज में विभाजन टला: इस समझौते से हिंदू समाज के भीतर एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक विभाजन होने से बच गया।
दलितों को बड़ा राजनीतिक प्रतिनिधित्व: भले ही पृथक निर्वाचिका रद्द हुई, लेकिन दलितों को विधायिकाओं में पहले से दोगुनी से भी अधिक आरक्षित सीटें मिलीं।
सामाजिक सुधार को गति: पूना पैक्ट के बाद महात्मा गांधी ने अपना ध्यान छुआछूत विरोधी आंदोलन और ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना पर केंद्रित किया।
📊 घटनाक्रम की त्वरित समयरेखा (Quick Timeline)
1929 (दिसंबर) ──► पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव (लाहौर अधिवेशन) 1930 (26 जनवरी) ──► पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया 1930 (मार्च-अप्रैल)► दांडी यात्रा एवं नमक सत्याग्रह 1931 (5 मार्च) ──► गांधी-इरविन समझौता 1931 (अंत) ──► द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (गांधीजी का लंदन दौरा) 1932 (16 अगस्त) ──► कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा 1932 (24 सितंबर)► पूना पैक्ट (गांधीजी और डॉ. आंबेडकर)
Amit Poonia
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