सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization): संपूर्ण विवरण

सिंधु घाटी सभ्यता (2500 ई.पूर्व से 1500 ई.पूर्व) भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन और विश्व की प्रमुख चार नदी घाटी सभ्यताओं में से एक है। इसे इसकी उन्नत नगर योजना और कलात्मक शिल्प के कारण कांस्य युगीन सभ्यता (Bronze Age Civilization) भी कहा जाता है।

1. नामांकरण और भौगोलिक विस्तार

नामांकरण

  • सिंधु घाटी सभ्यता: प्रारंभ में इसके अधिकांश स्थल सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के आसपास पाए गए थे।

  • हड़प्पा सभ्यता: इस सभ्यता का सबसे पहला खोजा गया स्थल हड़प्पा था, इसलिए इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है।

  • सरस्वती-सिंधु सभ्यता: बाद के उत्खननों में प्राचीन सरस्वती नदी के शुष्क मार्ग के आसपास भी कई स्थल पाए गए।

भौगोलिक विस्तार

यह सभ्यता लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी:

  • उत्तर (Northern boundary): मांडा (जम्मू-कश्मीर) – चिनाब नदी के तट पर।

  • दक्षिण (Southern boundary): दैमाबाद (महाराष्ट्र) – प्रवरा नदी के तट पर।

  • पूर्व (Eastern boundary): आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) – हिंडन नदी के तट पर।

  • पश्चिम (Western boundary): सुत्कागेनडोर (पाकिस्तान-ईरान सीमा) – दाश्क नदी के तट पर।

2. प्रमुख केंद्र एवं उनकी खोजें

  • हड़प्पा (Harappa): इसकी खोज 1921 में दयाराम साहनी ने रावी नदी के तट पर (पंजाब, पाकिस्तान) की थी। यहाँ से R-37 कब्रिस्तान, 6-6 अन्नागार की पंक्तियाँ और तांबे का इकबाल प्राप्त हुआ है।

  • मोहनजोदड़ो (Mohenjo-daro): इसकी खोज 1922 में राखालदास बनर्जी ने सिंधु नदी के तट पर (सिंध, पाकिस्तान) की थी। इसे ‘मृतकों का टीला’ भी कहा जाता है। यहाँ विशाल स्नानागार (Great Bath), विशाल अन्नागार और कांस्य की नर्तकी मूर्ति मिली है।

  • लोथल (Lothal): इसकी खोज 1954 में एस. आर. राव ने भोगवा नदी के तट पर (गुजरात, भारत) की थी। यहाँ विश्व का प्राचीनतम कृत्रिम बंदरगाह (Dockyard), चावल के साक्ष्य और मनके बनाने का कारखाना मिला है।

  • कालीबंगा (Kalibangan): इसकी खोज 1960 में बी. बी. लाल व बी. के. थापर ने घग्गर नदी के तट पर (राजस्थान, भारत) की थी। यहाँ जूते हुए खेत के साक्ष्य, अग्नि वेदिकाएँ और लकड़ी की नाली पाई गई है।

  • धौलावीरा (Dholavira): इसकी खोज जे. पी. जोशी और आर. एस. बिष्ट ने कच्छ क्षेत्र में (गुजरात, भारत) की थी। यह नगर तीन भागों में विभाजित था और यहाँ विशाल जल संरचना (Water Reservoir) और साइनबोर्ड मिला है।

  • राखीगढ़ी (Rakhigarhi): इसकी खोज 1969 में सूरजभान ने घग्गर नदी के तट पर (हरियाणा, भारत) की थी। यह भारत में स्थित सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है।

3. मुख्य विशेषताएँ

क) नगर नियोजन और वास्तुकला

  • ग्रिड प्रणाली: सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90°) पर काटती थीं, जिससे पूरा नगर आयताकार खंडों में विभाजित था।

  • दोहरा विभाजन: नगर दो भागों में बंटे थे—दुर्ग (Citadel), जो पश्चिमी भाग में ऊँचे टीले पर था (शासक वर्ग हेतु), और निचला नगर (Lower Town), जो पूर्वी भाग में था (आम जनता हेतु)।

  • पक्की ईंटें: निर्माण कार्य में 1:2:4 के अनुपात वाली पक्की ईंटों का बहुतायत से प्रयोग होता था।

ख) उत्कृष्ट जल निकासी प्रणाली

  • प्रत्येक घर की नाली बाहर सड़क की मुख्य ढकी हुई नालियों से जुड़ती थी।

  • नालियों के निर्माण में चूने और जिप्सम का प्रयोग किया जाता था।

  • सफाई के लिए जगह-जगह पर निरीक्षण छिद्र (Manholes) बने हुए थे।

ग) सामाजिक एवं धार्मिक जीवन

  • मातृसत्तात्मक समाज: बड़ी संख्या में मिली नारी मृण्मूर्तियों से अनुमान लगाया जाता है कि समाज मातृसत्तात्मक था।

  • मुख्य देवता: पशुपति नाथ (आदि शिव की मुहर), मातृदेवी की पूजा, वृक्ष (पीपल) और पशु पूजा (एकशृंगी वृषभ) प्रचलित थी।

  • शव विसर्जन: मृतकों को दफनाने और दाह-संस्कार दोनों के साक्ष्य मिले हैं। शवों का सिर सामान्यतः उत्तर दिशा की ओर रखा जाता था।

घ) आर्थिक जीवन और व्यापार

  • कृषि: मुख्य फसलें गेहूँ, जौ, सरसों, कपास (कपास उगाने वाले विश्व के प्रथम लोग), और तिल थीं।

  • व्यापार: आंतरिक और विदेशी (मेसोपोटामिया, सुमेरिया, ओमान) व्यापार अत्यंत समृद्ध था।

  • सिक्कों का अभाव: व्यापार पूरी तरह से वस्तु विनिमय (Barter System) और मुहरों द्वारा होता था।

4. लिपि और कला

  • चित्रलेखात्मक लिपि: सिंधु लिपि भाव-चित्रात्मक (Pictographic) थी, जो पहली पंक्ति में दाएं से बाएं और अगली पंक्ति में बाएं से दाएं लिखी जाती थी। इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

  • मुहरें: अधिकांश मुहरें सेलखड़ी (Steatite) पत्थर की बनी थीं, जिन पर पशुओं के चित्र और संक्षिप्त संदेश अंकित हैं।

  • कांस्य ढलाई: ‘लुप्त मोम विधि’ (Lost Wax Technique) द्वारा धातु की मूर्तियां बनाई जाती थीं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण मोहनजोदड़ो की ‘नर्तकी की मूर्ति’ है।

5. पतन के मुख्य कारण

लगभग 1900 ई.पूर्व के बाद इस सभ्यता का क्रमिक ह्रास शुरू हुआ। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित माने जाते हैं:

  • आकस्मिक बाढ़ (Floods): मार्शल और मैके के अनुसार मोहनजोदड़ो और लोथल का पतन बाढ़ के कारण हुआ।

  • जलवायु परिवर्तन व सूखा (Climate Change): ऑरेल स्टाइन और अमलानंद घोष के अनुसार सरस्वती नदी का सूखना पतन का मुख्य कारण था।

  • आर्यों का आक्रमण (Aryan Invasion): व्हीलर और गॉर्डन चाइल्ड के अनुसार बाहरी आक्रमण के साक्ष्य मिलते हैं।

  • प्राकृतिक आपदा (Epidemics/Earthquakes): के. यू. आर. कैनेडी के अनुसार महामारी या भूगर्भीय बदलाव इसके कारण बने।

Amit Poonia

Educator & Founder | English Era with Amit Poonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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