परिषद प्रणाली (Portfolio System / Council System) क्या थी?
इतिहास और भारतीय संविधान के विकास के संदर्भ में परिषद प्रणाली (Portfolio System) का अर्थ था—सरकार के अलग-अलग विभागों (जैसे गृह, वित्त, रक्षा, विदेश मामला आदि) को किसी एक विशिष्ट व्यक्ति या मंत्री को सौंपना और उसे उस विभाग के निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार बनाना।
इसे ही आधुनिक भाषा में ‘मंत्रालय व्यवस्था’ (Ministry / Cabinet System) कहा जाता है।
1. परिषद प्रणाली की शुरुआत किसने और कब की?
शुरुआत: भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) ने 1859 में इस व्यवस्था की शुरुआत प्रायोगिक (Experimental) तौर पर की थी।
कानूनी मान्यता: 1861 के इंडियन कौंसिल एक्ट (Indian Councils Act 1861) के तहत इसे आधिकारिक और वैधानिक (Legal) मान्यता दी गई।
2. इस प्रणाली से पहले क्या व्यवस्था थी?
1859 से पहले अंग्रेजों के शासन में केंद्रीकृत परिषद (Centralized Council) होती थी:
सरकार के पास आने वाली हर एक फाइल और निर्णय पर गवर्नर-जनरल और उनकी पूरी परिषद के सभी सदस्य मिलकर चर्चा करते थे।
समस्या: चाहे मुद्दा छोटा हो या बड़ा, जब तक पूरी कौंसिल बैठक करके फैसला नहीं लेती थी, तब तक काम रुका रहता था। इससे प्रशासनिक फाइलों का ढेर लग जाता था और निर्णय लेने में भारी देरी होती थी।
3. परिषद प्रणाली में क्या बदलाव हुआ?
लॉर्ड कैनिंग ने इस व्यवस्था को बदल दिया:
विभागों का बंटवारा: वायसराय की परिषद के प्रत्येक सदस्य को सरकार का एक या एक से अधिक विशिष्ट विभाग (Portfolio) सौंप दिया गया।
स्वतंत्र निर्णय का अधिकार: वह सदस्य अपने विभाग के सामान्य और रोजमर्रा के फैसले अकेले लेने के लिए अधिकृत था।
वायसराय का हस्तक्षेप: केवल अत्यंत महत्वपूर्ण या नीतिगत मामलों को ही वायसराय या पूरी परिषद के सामने अंतिम स्वीकृति के लिए लाया जाता था।
4. भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
आधुनिक कैबिनेट का आधार: भारत में आज जो कैबिनेट मंत्री (जैसे गृह मंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री) अपने-अपने विभागों को संभालते हैं, उसकी नींव 1861 के इसी ‘पोर्टफोलियो सिस्टम’ से रखी गई थी।
प्रशासनिक दक्षता: इससे सरकारी कामकाज में तेजी आई और निर्णय प्रक्रिया में लालफीताशाही (Red Tapism) कम हुई।
केंद्र (Central) और प्रांतों (Provinces) में विधान परिषदों का विभाजन
1861 और 1892 के इंडियन कौंसिल एक्ट के तहत अंग्रेजों ने विधायिका (Legislature) को दो स्तरों पर विभाजित किया:
केंद्रीय विधान परिषद (Central Legislative Council) — केंद्र/देश के स्तर पर।
प्रांतीय विधान परिषदें (Provincial Legislative Councils) — राज्यों/प्रांतों के स्तर पर।
यह ठीक वैसा ही ढांचा था जैसा आज भारत में संसद (Lok Sabha / Rajya Sabha) और राज्यों की विधान सभाओं (State Legislative Assemblies) के रूप में देखने को मिलता है।
1. दोनों स्तरों की संरचना एवं विभाजन (Comparison Structure)
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│ ब्रिटिश कालीन विधान परिषद ढांचा │
└──────────────────────┬───────────────────────┘
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[केंद्रीय विधान परिषद - Center] [प्रांतीय विधान परिषदें - Provinces]
• प्रमुख: वायसराय (Viceroy) • प्रमुख: प्रांतीय राज्यपाल (Governor)
• कार्य क्षेत्र: संपूर्ण भारत के लिए कानून • कार्य क्षेत्र: केवल संबंधित प्रांत के लिए कानून
• स्थान: कलकत्ता (तत्कालीन राजधानी) • स्थान: बॉम्बे, मद्रास, बंगाल आदि
2. विस्तृत कार्य एवं संरचना का विभाजन
(क) केंद्रीय विधान परिषद (Central Legislative Council)
प्रमुख (Head): भारत का वायसराय (Viceroy)।
सदस्यों का ढांचा:
आधिकारिक सदस्य (Official Members): वायसराय की कार्यकारिणी परिषद (Executive Council) के अंग्रेज सदस्य।
अतिरिक्त / गैर-सरकारी सदस्य (Non-official Members): जिन्हें वायसराय द्वारा मनोनीत किया जाता था।
1861 में: 6 से 12 सदस्य।
1892 में: 10 से 16 सदस्य।
कार्य व अधिकार:
पूरे भारत (सभी प्रांतों और रियासतों) के लिए कानून बनाना।
सेना, विदेश मामले, डाक-तार, कर (Taxation) और केंद्रीय वित्त जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णय लेना।
(ख) प्रांतीय विधान परिषदें (Provincial Legislative Councils)
1861 के अधिनियम द्वारा मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसियों को अपनी-अपनी प्रांतीय परिषदें बनाने और कानून बनाने का अधिकार वापस दिया गया (विकेंद्रीकरण की शुरुआत)।
प्रमुख (Head): संबंधित प्रांत का गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर।
विभिन्न प्रांतों में गठन:
बंबई (Bombay) एवं मद्रास (Madras): 1861 में स्थापित।
बंगाल (Bengal): 1862 में स्थापित।
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP): 1886 में स्थापित।
पंजाब (Punjab): 1897 में स्थापित।
सदस्यों का मनोनयन (1892 का तरीका):
प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का मनोनयन स्थानीय निकायों जैसे—नगर पालिका (Municipalities), जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय और जमींदारों की सिफारिश पर गवर्नर द्वारा किया जाता था।
कार्य व अधिकार:
केवल अपने प्रांत की सीमा के भीतर स्थानीय मुद्दों (जैसे—स्वास्थ्य, स्थानीय कर, कानून-व्यवस्था, सिंचाई) पर कानून बनाना।
3. केंद्र और प्रांत के बीच शक्तियों और नियंत्रण का संबंध
भले ही प्रांतों को कानून बनाने का अधिकार दिया गया था, लेकिन केंद्रीकरण (Central Power) की पकड़ बहुत मजबूत थी:
वायसराय की पूर्व स्वीकृति: प्रांतीय परिषदों द्वारा पारित किसी भी विधेयक (Bill) को लागू होने से पहले प्रांतीय गवर्नर और फिर अंत में वायसराय की स्वीकृति (Approval) मिलना अनिवार्य था।
वीटो पावर (Veto Power): वायसराय के पास प्रांतीय कानूनों को रद्द करने का अंतिम अधिकार सुरक्षित रहता था।
केंद्रीय कानून की सर्वोपरि-सत्ता: यदि किसी मुद्दे पर केंद्रीय कानून और प्रांतीय कानून में टकराव होता था, तो केंद्रीय कानून ही मान्य होता था।
प्रशासनिक व परिषद अधिनियम (1861 एवं 1892):
1857 के गदर और 1858 के अधिनियम द्वारा सत्ता हस्तांतरण के बाद अंग्रेजों को महसूस हुआ कि भारतीयों को पूरी तरह दरकिनार करके इतने बड़े देश पर शासन नहीं चलाया जा सकता। इसी सोच के तहत ब्रिटिश संसद ने 1861 और 1892 में दो ‘इंडियन कौंसिल एक्ट’ (Indian Councils Act) पारित किए।
इन अधिनियमों का मुख्य उद्देश्य भारत में विधायिका (Legislative System) और प्रशासनिक ढांचे का विस्तार करना तथा नाममात्र के लिए ही सही, भारतीयों को शासन प्रक्रिया में शामिल करना था।
1. 1861 का इंडियन कौंसिल एक्ट (Indian Councils Act 1861)
1861 का अधिनियम भारत में संवैधानिक और विधायी विकास की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था।
मुख्य प्रावधान (Key Provisions):
प्रतिनिधि संस्थाओं की शुरुआत (Inclusion of Indians):
कानून बनाने की प्रक्रिया में पहली बार भारतीयों को शामिल किया गया।
वायसराय को अपनी विस्तारित विधान परिषद में कम से कम 6 और अधिकतम 12 गैर-सरकारी (Non-official) सदस्यों को मनोनीत (Nominate) करने का अधिकार मिला।
1862 में प्रथम मनोनयन: वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने 3 भारतीयों को मनोनीत किया:
पटियाला के महाराजा (नरेंद्र सिंह)
बनारस के राजा (देव नारायण सिंह)
सर दिनकर राव
पोर्टफोलियो / विभागीय प्रणाली की शुरुआत (Portfolio System):
लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में शुरू की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को इस कानून के तहत वैधानिक (Legal) मान्यता मिली।
इसके तहत वायसराय की परिषद के एक सदस्य को सरकार के एक या अधिक विभागों का प्रभारी बनाया गया, जिसे उस विभाग के संबंध में अंतिम आदेश जारी करने का अधिकार था। (यही आज की कैबिनेट / मंत्रालय व्यवस्था का आधार बनी)।
विधायी शक्तियों का विकेंद्रीकरण (Decentralization):
मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों की कानून बनाने की वे शक्तियाँ पुनः लौटा दी गईं, जो 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा उनसे छीन ली गई थीं।
इसके तहत बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत – NWFP (1886) और पंजाब (1897) में नई विधान परिषदों का गठन हुआ।
अध्यादेश जारी करने की शक्ति (Ordinance Making Power):
आपातकाल (Emergency) में वायसराय को बिना विधान परिषद की अनुमति के अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार दिया गया। ऐसे अध्यादेश की अवधि 6 माह होती थी (जो आज के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में भी देखा जा सकता है)।
2. 1892 का इंडियन कौंसिल एक्ट (Indian Councils Act 1892)
1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना के बाद, शिक्षित भारतीयों ने विधान परिषदों में सुधार, अधिक प्रतिनिधित्व और वित्तीय मामलों में अधिकारों की मांग जोर-शोर से उठाई। इसी दबाव के परिणामस्वरूप 1892 का अधिनियम लाया गया।
मुख्य प्रावधान (Key Provisions):
विधान परिषदों का विस्तार (Expansion of Councils):
केंद्रीय (Central) और प्रांतीय (Provincial) विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 10 और अधिकतम 16 कर दी गई।
परोक्ष निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत (Indirect Election System):
भले ही कानून में ‘चुनाव’ (Election) शब्द का स्पष्ट प्रयोग नहीं था, लेकिन गैर-सरकारी सदस्यों के चयन के लिए एक परोक्ष (अप्रत्यक्ष) प्रक्रिया शुरू की गई:
केंद्रीय विधान परिषद के सदस्यों का नामांकन बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स और प्रांतीय विधान परिषदों की सिफारिश पर होता था।
प्रांतीय परिषदों में सदस्यों का मनोनयन नगर पालिकाओं (Municipalities), जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों और ज़मींदारों की सिफारिश पर वायसराय/राज्यपाल द्वारा किया जाता था।
वित्तीय व बजटीय अधिकार (Financial Rights):
भारतीयों को इतिहास में पहली बार बजट (Budget) पर बहस करने का अधिकार मिला।
कार्यपालिका (Executive) से जनहित के मामलों पर 6 दिन की पूर्व सूचना देकर प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया।
📊 त्वरित सारांश तालिका (Quick Summary Table)
| आधार (Basis) | केंद्रीय विधान परिषद (Central) | प्रांतीय विधान परिषदें (Provincial) |
| मुख्य अध्यक्ष | भारत का वायसराय (Viceroy) | संबंधित प्रांत का गवर्नर / लेफ्टिनेंट गवर्नर |
| क्षेत्रीय अधिकार | संपूर्ण ब्रिटिश भारत | केवल संबंधित प्रांत (जैसे बंगाल, बॉम्बे, मद्रास) |
| 1892 के तहत चयन | बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स व प्रांतीय परिषदों की सिफारिश पर | जिला बोर्ड, नगर पालिका, विश्वविद्यालय आदि की सिफारिश पर |
अमित पूनिया
संस्थापक एवं शिक्षक | EnglishEraWithAmitPoonia