राज्य और 4 आवश्यक तत्त्व: परिभाषा एवं मूलभूत सिद्धांत: (State and Its 4 Essential Elements)
राजनीति विज्ञान (Political Science) का केंद्रीय विषय ‘राज्य‘ (State) है। प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री गार्नर (Garner) के अनुसार— “राजनीति विज्ञान का प्रारंभ और अंत राज्य के साथ ही होता है।”
आम भाषा में हम राजस्थान, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रांतों को ‘राज्य’ कह देते हैं, लेकिन राजनीति विज्ञान की दृष्टि से ये राज्य नहीं बल्कि ‘प्रांत’ (Provinces/States in a Federation) हैं। राजनीति विज्ञान में ‘राज्य’ का तात्पर्य एक संपूर्ण, स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र/इकाई (जैसे- भारत, अमेरिका, फ्रांस) से होता है।
राजनीति विज्ञान में राज्य और 4 आवश्यक तत्त्व का अध्ययन किसी भी देश की स्वतंत्र पहचान और व्यवस्था को समझने की प्राथमिक कुंजी है। साधारण भाषा में राज्य का अर्थ किसी देश या राष्ट्र से होता है, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से कोई भी समाज या क्षेत्र तब तक पूर्ण राज्य नहीं कहला सकता जब तक कि उसमें राज्य और 4 आवश्यक तत्त्व एक साथ विद्यमान न हों। यदि इनमें से एक भी घटक अनुपस्थित हो, तो वह निकाय संप्रभु राज्य की श्रेणी में नहीं आता। ये चार अनिवार्य तत्त्व हैं:
जनसंख्या (Population)
निश्चित भू-भाग (Fixed Territory)
सरकार (Government)
संप्रभुता (Sovereignty)
1. राज्य की परिभाषा (Definition of State)
राजनीति विज्ञान में विभिन्न विचारकों ने राज्य की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं:
गार्नर (Garner):
“राज्य व्यक्तियों का एक ऐसा समुदाय है जो किसी निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से रहता है, जो बाहरी नियंत्रण से पूरी तरह स्वतंत्र या लगभग स्वतंत्र होता है, और जिसकी एक संगठित सरकार होती है जिसकी आज्ञा का पालन वहाँ की अधिकांश जनता स्वभावतः करती है।”
अरस्तू (Aristotle – ‘राजनीति विज्ञान के जनक’):
“राज्य परिवारों और गाँवों का एक ऐसा समुदाय है जिसका उद्देश्य एक पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है।”
वुड्रो विल्सन (Woodrow Wilson):
“किसी निश्चित भू-भाग के भीतर कानून के लिए संगठित लोग ही राज्य हैं।”
2. राज्य और 4 आवश्यक तत्त्व (4 Essential Elements of State)
किसी भी जन-समूह या संस्था को राजनीति विज्ञान के अनुसार ‘राज्य’ कहलाने के लिए 4 आवश्यक तत्त्वों का एक साथ होना अनिवार्य है। यदि इनमें से एक भी तत्त्व अनुपस्थित हो, तो उसे राज्य नहीं माना जा सकता।
(i) जनसंख्या (Population)
राज्य एक मानवीय संस्था है, इसलिए इसके अस्तित्व के लिए मनुष्यों का होना सबसे पहली आवश्यकता है। बिना जन-समुदाय के राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
जनसंख्या कितनी होनी चाहिए?
प्लेटो (Plato): एक आदर्श राज्य की जनसंख्या 5,040 बताई थी।
रूसो (Rousseau): एक आदर्श राज्य के लिए 10,000 की जनसंख्या उपयुक्त मानी थी।
आधुनिक दृष्टिकोण: आज के युग में चीन और भारत जैसे अरबों की जनसंख्या वाले राज्य भी हैं और वैटिकन सिटी (लगभग 800 लोग) जैसे सूक्ष्म राज्य भी हैं। इसलिए जनसंख्या की कोई निश्चित संख्या तय नहीं है, लेकिन इतनी जनसंख्या जरूर होनी चाहिए कि राज्य अपनी सुरक्षा और जीवनयापन कर सके।
(ii) निश्चित भू-भाग (Fixed Territory)
केवल लोगों के इकट्ठा होने से राज्य नहीं बनता; जब तक वे किसी निश्चित और स्थायी भौगोलिक क्षेत्र में न रहते हों। घुमंतू या बंजारा जनजातियों (Nomads) की अपनी जनसंख्या होती है, लेकिन निश्चित भू-भाग न होने के कारण उन्हें राज्य नहीं कहा जा सकता।
भू-भाग में क्या-क्या शामिल है?
स्थल क्षेत्र (Land): राज्य की सीमा के अंदर की भूमि और नदियाँ।
वायुमंडल (Air Space): उस भूमि के ऊपर का आकाश।
समुद्री सीमा (Territorial Waters): तट से लगभग 12 समुद्री मील (Nautical Miles) तक का समुद्र।
(iii) सरकार (Government)
जनसंख्या और निश्चित भू-भाग होने के बाद भी यदि कोई एजेंसी या माध्यम न हो जो नियमों को लागू करे, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। सरकार राज्य का व्यावहारिक और दृश्यमान रूप (Visible Agent) है।
सरकार का मुख्य कार्य:
कानून बनाना (विधायिका – Legislature)
कानूनों को लागू करना (कार्यपालिका – Executive)
न्याय करना और विवादों को सुलझाना (न्यायपालिका – Judiciary)
अंतर: राज्य एक अमूर्त (Abstract) संस्था है जो कभी नहीं बदलती, जबकि सरकार एक मूर्त (Concrete) संस्था है जो समय-समय पर बदलती रहती है।
(iv) संप्रभुता (Sovereignty – “राज्य की आत्मा”)
संप्रभुता राज्य का सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट तत्त्व है, जो इसे अन्य सभी सामाजिक संगठनों (जैसे- क्लब, संघ, या कंपनियों) से अलग करता है। इसे ‘राज्य का प्राण’ (Soul of the State) कहा जाता है।
संप्रभुता का अर्थ: सर्वोच्च और निरंकुश शक्ति (Supreme Power)।
इसके दो मुख्य पहलू होते हैं:
आंतरिक संप्रभुता (Internal Sovereignty): राज्य अपने देश की सीमा के अंदर रहने वाले सभी नागरिकों, संस्थाओं और समूहों पर सर्वोच्च आदेश दे सकता है।
बाहरी संप्रभुता (External Sovereignty): राज्य किसी भी विदेशी शक्ति, दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन के नियंत्रण से पूरी तरह स्वतंत्र होता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण (15 अगस्त 1947 से पहले का भारत):
1947 से पहले भारत के पास विशाल जनसंख्या थी, निश्चित भू-भाग था, और ब्रिटिश सरकार भी थी। लेकिन भारत के पास ‘संप्रभुता’ नहीं थी (फैसले लंदन से लिए जाते थे)। इसलिए 15 अगस्त 1947 से पहले भारत राजनीति विज्ञान की दृष्टि से ‘राज्य’ नहीं था; वह केवल एक उपनिवेश (Colony) था। 15 अगस्त 1947 को संप्रभुता मिलते ही भारत एक पूर्ण राज्य बना।
📊 क्विक समरी: राज्य बनाम सरकार / प्रांत
| आधार | राज्य (State) | सरकार (Government) |
| प्रकृति | स्थायी और अमूर्त संस्था | अस्थायी और मूर्त (बदलने वाली) |
| क्षेत्र | इसमें 4 तत्त्व आते हैं | यह केवल राज्य का 3रा तत्त्व है |
| सदस्यता | सभी नागरिक इसके अनिवार्य सदस्य हैं | केवल कुछ चुने हुए प्रतिनिधि या अधिकारी |
| उदाहरण | भारत, अमेरिका, नेपाल | मोदी सरकार, बाइडेन प्रशासन |
Amit Poonia
Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia
🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com