1. रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act – 1919) एवं जलियांवाला बाग हत्याकांड
📌 रॉलेट एक्ट (मार्च 1919) – “काला कानून”
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने आंदोलनों को दबाने के लिए आपातकालीन नियम लागू किए थे। युद्ध समाप्त होने के बाद क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली सेडिशन कमेटी (Sedition Committee) की सिफारिशों पर ‘अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919’ पारित किया गया, जिसे आम भाषा में रौलेट एक्ट कहा जाता है।
मुख्य प्रावधान: पुलिस को अधिकार दिया गया कि वह किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए 2 साल तक जेल में बंद रख सकती है।
जनता की प्रतिक्रिया: भारतीयों ने इसे “अनारकी एक्ट” या “काला कानून” कहा। इसके बारे में प्रसिद्ध उक्ति थी— “न वकील, न अपील, न दलील”।
गांधी जी का कदम: गांधी जी ने इस कानून के विरोध में ‘सत्याग्रह सभा’ बनाई और 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल (रॉलेट सत्याग्रह) का आह्वान किया।
📌 जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
पंजाब में रॉलेट एक्ट का विरोध बहुत उग्र था। 9 अप्रैल 1919 को अमृतसर के दो प्रमुख लोकप्रिय नेताओं—डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे जनता में भारी रोष फैल गया।
घटनाक्रम: 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में अपने नेताओं की गिरफ्तारी और रॉलेट एक्ट के विरोध में एक शांतिपूर्ण जनसभा का आयोजन किया गया।
नरसंहार: अमृतसर का सैन्य कमांडर जनरल डायर अपनी सशस्त्र सेना के साथ पहुँचा। उसने बाग के एकमात्र संकरे बाहर निकलने वाले रास्ते को बंद कर दिया और बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया।
हताहत: लगभग 10-15 मिनट तक लगातार अंधाधुंध फायरिंग हुई। सरकारी आँकड़ों (हंटर कमेटी) के अनुसार 379 लोग मारे गए, लेकिन वास्तव में 1000 से अधिक निर्दोष लोग और बच्चे शहीद हुए थे।
परिणाम और प्रतिक्रिया:
रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी ‘नाइटहुड’ (Sir) की उपाधि त्याग दी।
शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद (Executive Council) से इस्तीफा दे दिया।
घटना की जाँच के लिए अंग्रेजों ने हंटर आयोग (Hunter Commission) का गठन किया, जिसने जनरल डायर के कृत्य को केवल “कर्तव्य की गलत धारणा” बताकर मामले को रफा-दफा कर दिया।
2. खिलाफत और असहयोग आंदोलन (Khilafat & Non-Cooperation Movement: 1920–1922)
📌 खिलाफत आंदोलन (1919–1920)
कारण: प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) को हरा दिया। तुर्की के सुल्तान को दुनिया भर के मुसलमान अपना ‘खलीफा’ (धार्मिक प्रमुख) मानते थे। युद्ध के बाद ब्रिटेन ने तुर्की साम्राज्य का विभाजन कर खलीफा के पद को अपमानित किया।
भारतीय पृष्ठभूमि: भारत में खलीफा के सम्मान की पुनर्स्थापना के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद, शौकत अली और मोहम्मद अली (अली बंधु) ने ‘ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी’ का गठन किया।
गांधी जी की दूरदर्शिता: गांधी जी ने इस अवसर को हिंदू-मुस्लिम एकता कायम करने के एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखा और मुसलमानों का समर्थन किया।
📌 असहयोग आंदोलन का स्वरूप और शुरुआत (1920)
सितंबर 1920 के कोलकाता विशेष अधिवेशन और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
आंदोलन के दो मुख्य पहलू थे:
बहिष्कार (Boycott – नकारात्मक पक्ष):
सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का पूर्ण त्याग।
विदेशी कपड़ों और वस्तुओं की होली जलाना।
सरकारी उपाधियों और पदों का त्याग (गांधी जी ने ‘कैसर-ए-हिंद’ पदक लौटा दिया)।
विधायिकाओं और सरकारी समारोहों का बहिष्कार।
रचनात्मक कार्य (Constructive Work – सकारात्मक पक्ष):
स्वदेशी वस्तुओं (खादी और चरखा) का प्रचार-प्रसार।
राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों की स्थापना (जैसे जामिया मिलिया इस्लामिया, काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ)।
अस्पृश्यता (छुआछूत) का उन्मूलन और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना।
‘तिलक स्वराज फंड’ में 1 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जुटाना।
📌 चौरी-चौरा कांड (5 फरवरी 1922) एवं आंदोलन की वापसी
असहयोग आंदोलन पूरे देश में अपनी चरम सीमा पर था और जनता में अभूतपूर्व उत्साह था। लेकिन तभी एक हिंसक घटना ने पूरे आंदोलन का रुख मोड़ दिया।
घटना: 5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर भगवान अहीर के नेतृत्व में पुलिस के अत्याचारों के विरोध में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला जा रहा था।
हिंसा: पुलिस द्वारा गोलियाँ चलाए जाने के बाद उग्र भीड़ ने पुलिस थाने को घेर लिया और उसमें आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए।
आंदोलन का अंत:
अहिंसा के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध गांधी जी इस घटना से बेहद दुखी हुए।
उन्होंने 12 फरवरी 1922 को बारदोली (गुजरात) में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई और असहयोग आंदोलन को तत्काल प्रभाव से वापस (Suspend) लेने की घोषणा की।
नेताओं की प्रतिक्रिया: जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, और सीआर दास जैसे युवा नेताओं ने आंदोलन वापस लेने के फैसले का कड़ा विरोध किया। सुभाष चंद्र बोस ने कहा था— “जब जनता का उत्साह अपने चरम पर था, तब आंदोलन को वापस लेने का आदेश देना किसी राष्ट्रीय विपत्ति से कम नहीं था।”
गांधी जी की गिरफ्तारी: मार्च 1922 में गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और 6 साल की जेल की सजा सुनाई गई।
📊 घटनाक्रम का संक्षिप्त सारणीबद्ध अवलोकन (1919–1922)
| तिथि / वर्ष | घटना | मुख्य कारण / प्रभाव |
| मार्च 1919 | रॉलेट एक्ट | बिना ट्रायल 2 साल जेल; “काला कानून”। |
| 13 अप्रैल 1919 | जलियांवाला बाग हत्याकांड | जनरल डायर द्वारा निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाना; टैगोर ने ‘नाइटहुड’ लौटाया। |
| 1919–1920 | खिलाफत आंदोलन | तुर्की के खलीफा के अधिकारों की रक्षा के लिए अली बंधुओं द्वारा आंदोलन। |
| 1920–1922 | असहयोग आंदोलन | स्वदेशी का अपनाव, सरकारी उपाधियों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार। |
| 5 फरवरी 1922 | चौरी-चौरा कांड | गोरखपुर में 22 पुलिसकर्मियों की थाने में जलकर मौत; अहिंसा का उल्लंघन। |
| 12 फरवरी 1922 | आंदोलन की वापसी | गांधी जी द्वारा बारदोली में असहयोग आंदोलन समाप्त करने की घोषणा। |
Amit Poonia
Founder & Educator | English Era With Amit Poonia
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