TOPIC 1: भारत में अंग्रेजों का आगमन (Arrived in India)
1. ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (1600 ईस्वी)
स्थापना तिथि: 31 दिसंबर 1600
‘Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies’ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) का मूल और आधिकारिक कानूनी नाम (Original Legal Name) था।
जब 31 दिसंबर 1600 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने इस कंपनी को पूर्वी देशों (भारत, इंडोनेशिया आदि) के साथ व्यापार करने के लिए ‘शाही फरमान’ (Royal Charter) जारी किया था, तब इसे यही नाम दिया गया था।
A. इस नाम का मतलब क्या है?
Governor (गवर्नर): कंपनी का सर्वोच्च प्रशासनिक प्रमुख।
Company of Merchants of London: लंदन के व्यापारी, जिन्होंने मिलकर इस संयुक्त पूंजी कंपनी (Joint-Stock Company) में अपना पैसा लगाया था।
Trading into the East Indies: ‘ईस्ट इंडीज’ उस दौर में भारत, दक्षिण-पूर्वी एशिया और आसपास के द्वीपों के लिए इस्तेमाल होने वाला भौगोलिक शब्द था।
यानी इसका शाब्दिक अर्थ था: “लंदन के व्यापारियों की वह संस्था और उनका गवर्नर जो ईस्ट इंडीज के साथ व्यापार करते हैं।”
B. यह नाम कब तक रहा और कैसे बदला?
1600 से 1708 तक: कंपनी अपने इसी लंबे आधिकारिक नाम से जानी जाती रही।
1708 ईस्वी में विलय: 1708 में ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कंपनी की एक प्रतिद्वंद्वी कंपनी के साथ इसका विलय (Merge) हुआ, जिसके बाद इसका आधिकारिक नाम बदलकर ‘The United Company of Merchants of England Trading to the East Indies’ कर दिया गया।
1833 का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1833): ब्रिटिश संसद ने कानून पारित करके इसके आधिकारिक नाम को छोटा कर दिया और इसे औपचारिक रूप से ‘East India Company’ (ईस्ट इंडिया कंपनी) नाम दिया। आम बोलचाल में लोग इसे पहले से ही ईस्ट इंडिया कंपनी कहते थे।
C. संक्षिप्त सारांश
यह कोई अलग कंपनी नहीं थी, बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी का ही शुरुआती और असली कागजी नाम था, जिसने भारत में एक व्यापारिक संस्था के रूप में कदम रखा और धीरे-धीरे पूरे भारत पर अपना राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लिया।
मूल कारण: यूरोप में वाणिज्यवाद (Mercantilism) का बोलबाला था। ब्रिटिश व्यापारी पूर्वी देशों (विशेषकर भारत और इंडोनेशिया) से मसाले, रेशम, सूती वस्त्र और शोरा (Saltpetre) जैसे बहुमूल्य सामानों के व्यापार पर अपना एकाधिकार (Monopoly) स्थापित करना चाहते थे।
शाही सनद (Royal Charter): महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ‘Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies’ को 15 वर्षों के लिए पूर्व के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया।
इस घटना से जुड़े 3 महत्वपूर्ण तथ्य
शुरुआती स्वरूप: प्रारंभ में यह एक विशुद्ध व्यापारिक संस्था (Private Trading Enterprise) थी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना था, न कि भारत पर शासन करना।
प्रतिद्वंद्वियों का डर: अंग्रेजों के आगमन से पहले डच (Dutch) और पुर्तगाली (Portuguese) व्यापारी हिंद महासागर और भारतीय व्यापार पर हावी थे। अंग्रेजों का मुख्य लक्ष्य इन यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना था।
एकाधिकार का अर्थ: चार्टर का मतलब यह था कि ब्रिटेन की कोई अन्य कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी की अनुमति के बिना पूर्व के देशों के साथ व्यापार नहीं कर सकती थी।
इसके बाद क्या हुआ? (Chronological Next Step)
1608 ईस्वी: कंपनी का पहला जहाजी बेड़ा कैप्टन विलियम हॉकिंस के नेतृत्व में सूरत बंदरगाह पहुँचा।
1609 ईस्वी: हॉकिंस मुगल सम्राट जहाँगीर के आगरा स्थित दरबार में पहुँचा, ताकि भारत में पहली व्यापारिक कोठी (Factory) खोलने की इजाज़त ली जा सके।
2. मुगल दरबार में आगमन और व्यापार की इजाज़त (1608–1615 ईस्वी)
कैप्टन विलियम हॉकिंस (1608 ईस्वी):
जहाज का नाम: हॉकिंस ‘हेक्टर’ (Hector) नामक जहाज से भारत के सूरत बंदरगाह पहुँचा।
मुगल दरबार में उपस्थिति: 1609 ईस्वी में वह आगरा में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में हाज़िर हुआ।
विशेषता: हॉकिंस तुर्की और फ़ारसी भाषा का अच्छा जानकार था। उसने जहाँगीर से फ़ारसी में बात की, जिससे प्रभावित होकर जहाँगीर ने उसे ‘इंग्लिश खान’ की उपाधि दी और 400 का मनसब प्रदान किया।
परिणाम: पुर्तगालियों के कड़े विरोध और स्थानीय दबाव के कारण हॉकिंस को सूरत में स्थायी कोठी खोलने का शाही फरमान तुरंत नहीं मिल सका और उसे 1611 में वापस लौटना पड़ा।
सर थॉमस रो (1615 ईस्वी):
भूमिका: वह इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का आधिकारिक राजदूत (Official Ambassador) बनकर आया।
मुगल दरबार में उपस्थिति: वह अजमेर में जहाँगीर के दरबार में पेश हुआ और 1615 से 1619 ईस्वी तक भारत में रहा।
परिणाम: सर थॉमस रो की कूटनीति सफल रही। उसने मुगल साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों—विशेषकर सूरत, भड़ौच और अहमदाबाद—में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक कोठियाँ (Factories) स्थापित करने और व्यापार करने का फरमान (शाही अनुमति) प्राप्त कर लिया।
इस दौर के 3 सबसे महत्वपूर्ण पहलू
व्यापारिक रणनीति में बदलाव: हॉकिंस एक कंपनी प्रतिनिधि के रूप में आया था, जबकि सर थॉमस रो ब्रिटेन के राजा का सीधा राजदूत था। राजकीय स्तर की कूटनीति ने अंग्रेजों को मुगल दरबार में स्थायी जगह दी।
पुर्तगाली प्रभाव का खात्मा: 1612 ईस्वी में स्वाली के युद्ध (Battle of Swally) में अंग्रेजों (कैप्टन बेस्ट) ने पुर्तगाली जहाजी बेड़े को हराया, जिससे जहाँगीर के मन में अंग्रेजों की नौसैनिक शक्ति (Naval Power) की धाक जम गई।
शुरुआती कोठियों (Factories) का स्वरूप: इस समय ‘फैक्ट्री’ का मतलब कोई सामान बनाने वाला कारखाना नहीं, बल्कि एक गोदाम (Warehouse) और कंपनी के अधिकारियों के रहने का सुरक्षित केंद्र था।
इसके बाद क्या हुआ? (Chronological Next Step)
1639 ईस्वी: अंग्रेजों ने दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत की और चंद्रगिरी के राजा से भूमि प्राप्त करके मद्रास (फोर्ट सेंट जॉर्ज) की स्थापना की।
1668 ईस्वी: ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाल से दहेज में मिले बॉम्बे (मुंबई) को कंपनी को किराए पर सौंप दिया गया।
A. महत्वपूर्ण शब्दावली: ‘फैक्ट्री’ (Factory) का वास्तविक अर्थ क्या था?
17वीं और 18वीं शताब्दी के इतिहास (विशेषकर ईस्ट इंडिया कंपनी के संदर्भ में) में ‘फैक्ट्री’ (Factory) शब्द का मतलब आज की आधुनिक कारखानों से बिल्कुल अलग था। यह कोई सामान बनाने वाली जगह नहीं, बल्कि एक व्यापारिक केंद्र (Trading Center / Fortified Depot) होता था।
फैक्ट्री के 3 मुख्य कार्य:
- गोदाम (Warehouse):भारत के अलग-अलग हिस्सों से खरीदे गए सामान (जैसे मसाले, सूती कपड़ा, रेशम, नील और शोरा) को सुरक्षित जमा करना।
- कंपनी का कार्यालय और आवास:ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, व्यापारी और क्लर्क इसी परिसर में रहकर कागज़ी काम संभालते थे।
- व्यापारियों का बेस:कंपनी के व्यापारियों को ‘फैक्टर्स’ (Factors) कहा जाता था। ‘फैक्टर्स’ के काम करने की जगह होने के कारण इसे ‘फैक्ट्री’ कहा गया।
B. महत्वपूर्ण शब्दावली: किलेबंद (Fortified) से क्या तात्पर्य है?
किलेबंद (Fortified) का सीधा अर्थ है — किसी स्थान को सुरक्षा के उद्देश्य से चारों तरफ से ऊँची व मजबूत दीवारों, बुर्जों, खाई (moat) और तोपों से पूरी तरह घेर देना।
- ऊँची और मजबूत दीवारें:गोदामों के चारों ओर मोटी दीवारें बनाना ताकि कोई अनधिकृत प्रवेश न हो सके।
- सशस्त्र सुरक्षा और तोपें:दीवारों पर गार्ड तैनात करना और तोपें (cannons) लगाना ताकि स्थानीय राजाओं या प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय शक्तियों के हमलों से बचा जा सके।
- उदाहरण:मद्रास की फैक्ट्री को किलेबंद करके ‘Fort St. George’ और कलकत्ता की फैक्ट्री को किलेबंद करके ‘Fort William’ नाम दिया गया।
3. प्रारंभिक व्यापारिक केंद्र और 1717 का शाही फरमान
सूरत (1612 ईस्वी):
स्वाली (Swally) के नौसैनिक युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर पश्चिमी भारत में ब्रिटिश श्रेष्ठता साबित की।
इसके बाद सूरत अंग्रेजों की पश्चिमी तट पर पहली स्थायी व्यापारिक कोठी (Factory) बना।
मद्रास – फोर्ट सेंट जॉर्ज (1639 ईस्वी):
फ्रांसिस डे (Francis Day) ने चंद्रगिरी के राजा से मद्रास को पट्टे (Lease) पर लिया।
यहाँ अंग्रेजों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज (Fort St. George) नामक अपना पहला किलेबंद कारखाना स्थापित किया, जो दक्षिण भारत में उनका मुख्य केंद्र बना।
बॉम्बे (1668 ईस्वी):
1661 ईस्वी में ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन डी ब्रेगांज़ा से हुआ, जिसमें बॉम्बे अंग्रेजों को दहेज में मिला।
1668 ईस्वी में राजा ने बॉम्बे को मात्र 10 पाउंड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। बाद में सूरत की जगह बॉम्बे को पश्चिमी तट का मुख्यालय बनाया गया।
कलकत्ता – फोर्ट विलियम (1690 का दशक):
जॉब चार्नॉक (Job Charnock) ने तीन गाँवों—सुतानाती, गोविंदपुर और कालिकाता की ज़मींदारी प्राप्त की।
इन्हीं तीनों गाँवों को मिलाकर कलकत्ता (Kolkata) शहर की नींव रखी गई और यहाँ फोर्ट विलियम (Fort William) किले का निर्माण हुआ। Sir Charles Eyre इसके पहले अध्यक्ष बने।
1717 का फर्रुखसियर का शाही फरमान (Farrukhsiyar’s Farman)
घटना: मुगल सम्राट फर्रुखसियर एक गंभीर बीमारी से पीड़ित था, जिसका इलाज कंपनी के सर्जन विलियम हैमिल्टन (William Hamilton) ने किया। प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने कंपनी को एक शाही फरमान जारी किया।
प्रमुख शर्तें:
बंगाल में कर-मुक्त व्यापार: मात्र 3,000 रुपये वार्षिक के बदले कंपनी को बंगाल में बिना कोई अतिरिक्त चुंगी (Custom Duty) दिए व्यापार करने की छूट मिली।
दस्तक (Dastak) का अधिकार: कंपनी को व्यापारिक माल की आवाजाही के लिए मुफ़्त पास (दस्तक) जारी करने का अधिकार मिल गया।
सिक्के ढालने का अधिकार: बॉम्बे में ढले कंपनी के सिक्कों को पूरे मुगल साम्राज्य में चलाने की अनुमति मिली।
ऐतिहासिक प्रभाव: इतिहासकार ओर्म्स (Orme) ने इस फरमान को “ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्नाकार्टा” (Magna Carta) कहा। इसने बंगाल में अंग्रेजों को अन्य सभी भारतीय और यूरोपीय व्यापारियों से आगे खड़ा कर दिया और आगे चलकर यही फरमान नवाबों के साथ विवाद का मुख्य कारण बना।
इस दौर के 3 सबसे महत्वपूर्ण पहलू
व्यापारिक त्रि-कोण (Tri-angular Control): मद्रास (दक्षिण), बॉम्बे (पश्चिम) और कलकत्ता (पूर्व)—इन तीन प्रेसिडेंसियों ने पूरे भारत के तटीय व्यापार पर अंग्रेजों की पकड़ मजबूत कर दी।
व्यापारिक पास (दस्तक) का दुरुपयोग: कंपनी के निजी अधिकारी कर-मुक्त व्यापार के अधिकार का उपयोग अपने निजी व्यापार के लिए करने लगे, जिससे बंगाल के राजस्व को भारी नुकसान हुआ और नवाबों के साथ संघर्ष की नींव पड़ी।
सैन्य किलेबंदी (Fortification): फोर्ट सेंट जॉर्ज और फोर्ट विलियम केवल व्यापारिक गोदाम नहीं थे, बल्कि सैन्य सुरक्षा से लैस किले थे, जो भारत में अंग्रेजों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाते थे।
इसके बाद क्या हुआ? (Chronological Next Step)
1746–1763 ईस्वी: भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद अंग्रेजों का सामना फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी से हुआ, जिसके कारण दक्षिण भारत में कर्नाटक युद्ध (Carnatic Wars) लड़े गए।
Note: ईस्ट इंडिया कंपनी का ‘मैग्नाकार्टा’ (Magna Carta)
इतिहास में 1717 ईस्वी के मुगल सम्राट फर्रुखसियर के शाही फरमान (Farrukhsiyar’s Farman) को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार ऑर्मी (Orme) ने इस शाही फरमान के अत्यधिक लाभों और कंपनी की स्थिति को सुदृढ़ करने के कारण इसे मैग्नाकार्टा की संज्ञा दी थी।
फरमान जारी होने की पृष्ठभूमि (Background)
1715 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का एक प्रतिनिधिमंडल जॉन सुरमन (John Surman) के नेतृत्व में मुगल सम्राट फर्रुखसियर के दरबार में पहुँचा। इस दल में विलियम हैमिल्टन (William Hamilton) नामक एक सर्जन (डॉक्टर) भी शामिल था। हैमिल्टन ने सम्राट फर्रुखसियर को एक गंभीर और कष्टदायक बीमारी से मुक्ति दिलाई। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने 1717 ईस्वी में कंपनी के लिए तीन शाही फरमान (दस्तावेज़) जारी किए।
फरमान की मुख्य शर्तें और अधिकार (Key Provisions)
बंगाल में कर-मुक्त व्यापार (Tax-Free Trade):
कंपनी को मात्र 3,000 रुपये वार्षिक के भुगतान पर बंगाल में बिना कोई अतिरिक्त चुंगी (Custom Duty) दिए व्यापार करने की पूर्ण छूट मिल गई।
‘दस्तक’ (Passes) जारी करने का अधिकार:
कंपनी को अपने माल की कर-मुक्त आवाजाही और परिवहन के लिए विशेष पास यानी ‘दस्तक’ जारी करने की अनुमति मिली।
सिक्कों की वैधता:
मुंबई (बॉम्बे) में कंपनी द्वारा ढाले गए सिक्कों को संपूर्ण मुगल साम्राज्य में चलाने की मान्यता दे दी गई।
हैदराबाद और अहमदाबाद में विशेषाधिकार:
हैदराबाद में कंपनी को पहले से प्राप्त कर-मुक्त व्यापार के अधिकार को बनाए रखा गया।
सूरत में 10,000 रुपये वार्षिक देने के बदले कंपनी के माल को सभी प्रकार के करों से मुक्त कर दिया गया।
कोलकाता के आसपास ज़मीन किराए पर लेना:
कंपनी को कोलकाता के आसपास 38 और गाँवों को किराए पर लेने (ज़मींदारी प्राप्त करने) की अनुमति मिली।
‘मैग्नाकार्टा’ कहने के ऐतिहासिक कारण और प्रभाव
अद्वितीय व्यापारिक श्रेष्ठता: इस फरमान ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल के अन्य सभी भारतीय व्यापारियों और यूरोपीय प्रतिस्पर्धियों (जैसे फ्रांसीसी और डच) की तुलना में बहुत आगे खड़ा कर दिया।
कंपनी के निजी अधिकारियों द्वारा ‘दस्तक’ का दुरुपयोग: फरमान केवल कंपनी के व्यापार के लिए था, लेकिन इसके अधिकारियों ने अपने व्यक्तिगत व्यापार के लिए भी ‘दस्तक’ का दुरुपयोग शुरू कर दिया। इससे बंगाल के नवाबों को भारी राजस्व घाटा हुआ।
प्लासी और बक्सर के युद्ध की नींव: इसी फरमान और इसके दुरुपयोग के कारण आगे चलकर बंगाल के नवाबों (जैसे सिराजुद्दौला और मीर कासिम) और अंग्रेजों के बीच तनाव बढ़ा, जो 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध का मुख्य कारण बना।
BY Amit Poonia
Keep learning, Keep Growing! EnglishEraWithAmitPoona