तीनों आंग्ल-मराठा युद्ध

आंग्ल-मराठा युद्धों के दौरान हुई कुछ संधियाँ युद्ध से पहले (युद्ध का कारण बनकर) हुई थीं, तो कुछ संधियाँ युद्ध के बीच में या बाद में (परिणाम के रूप में) हुई थीं।

इसे आप तीनों युद्धों के आधार पर आसानी से समझ सकते हैं:

1. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1782)

  • सूरत की संधि (1775) — [युद्ध से ठीक पहले]:

    यह संधि युद्ध का मूल कारण बनी। राघोबा ने पेशवा बनने के लालच में अंग्रेजों के साथ यह संधि की थी, जिसके बाद अंग्रेजों ने मराठों पर हमला किया और युद्ध शुरू हुआ।

  • पुरंदर की संधि (1776) & बड़गाँव की संधि (1779) — [युद्ध के बीच में]:

    ये संधियाँ युद्ध के दौरान अलग-अलग झड़पों और लड़ाइयों के बाद स्थिति को संभालने के लिए हुई थीं।

  • सालबाई की संधि (1782) — [युद्ध के बाद / अंत में]:

    यह संधि युद्ध के समापन पर हुई। इसने प्रथम युद्ध को समाप्त किया और मराठों तथा अंग्रेजों के बीच 20 वर्षों की शांति स्थापित की।

2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805)

  • बेसिन की संधि (1802) — [युद्ध से ठीक पहले]:

    यह संधि भी द्वितीय युद्ध का मूल कारण बनी। बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों की ‘सहायक संधि’ स्वीकार कर ली, जिससे मराठा सरदारों (सिंधिया और भोसले) की स्वाधीनता छीन गई और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

  • देवगाँव की संधि (1803), सुरजी-अर्जनगाँव की संधि (1803) & राजघाट की संधि (1805) — [युद्ध के बाद / हारने पर]:

    जब अंग्रेजों ने मराठा सरदारों को अलग-अलग हराया, तब प्रत्येक सरदार की हार के बाद ये संधियाँ उनके साथ की गईं (जैसे भोसले के साथ देवगाँव और सिंधिया के साथ सुरजी-अर्जनगाँव)।

3. तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1818)

  • पूना व ग्वालियर की संधि (1817) — [युद्ध की शुरुआत और बीच में]:

    अंग्रेजों ने युद्ध शुरू होते ही मराठा संघ को तोड़ने और कमजोर करने के लिए ये संधियाँ थोपीं।

  • मंदसौर की संधि (1818) — [युद्ध के अंत में]:

    होल्कर की हार के बाद यह संधि हुई, जिसने तीसरे युद्ध का पूर्ण अंत किया और मराठा साम्राज्य का पतन सुनिश्चित कर दिया।

📌 एक लाइन में समझें:

  • सूरत की संधि (1775) और बेसिन की संधि (1802) जैसी संधियाँ युद्ध से पहले हुईं और युद्ध की वजह बनीं।

  • सालबाई (1782), देवगाँव (1803), सुरजी-अर्जनगाँव (1803) और मंदसौर (1818) जैसी संधियाँ युद्ध के बाद हुईं, जो हार-जीत के परिणाम स्वरूप लागू की गईं।

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