आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1818) और मराठा साम्राज्य का पतन
विषय: तीनों आंग्ल-मराठा युद्ध (वर्ष, पृष्ठभूमि, संधियाँ, परिणाम) और मराठा साम्राज्य के पतन के मुख्य कारण
🎭 पात्र (Characters)
अमित सर (Amit Sir): लीड एजुकेटर और इतिहास विशेषज्ञ।
रोहन (Rohan): प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा एक उत्सुक छात्र।
प्रिया (Priya): विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछने वाली मेधावी छात्रा।
🎬 संवाद (Classroom Conversation)
(अमित सर क्लास में प्रवेश करते हैं और ब्लैकबोर्ड पर मुख्य शीर्षक लिखते हैं: ‘अंग्रेज बनाम मराठा: 3 युद्ध, प्रमुख संधियाँ और साम्राज्य का पतन (1775–1818)’)
अमित सर: गुड मॉर्निंग बच्चों! आज की मास्टरक्लास में हम 18वीं और 19वीं सदी के उस ऐतिहासिक संघर्ष का विस्तृत विश्लेषण करेंगे जिसने आधुनिक भारत का भविष्य तय किया—अर्थात, मराठा साम्राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़े गए तीनों आंग्ल-मराठा युद्ध।
रोहन: गुड मॉर्निंग सर! सर, मुगलों के पतन के बाद तो मराठे ही पूरे भारत की सबसे बड़ी और शक्तिशाली ताकत थे, फिर अंग्रेज उन पर भारी कैसे पड़ गए?
अमित सर: बेहतरीन सवाल, रोहन! 18वीं सदी में मराठा साम्राज्य ही एकमात्र ऐसी शक्ति था जो अंग्रेजों के भारत-विजय के सपने को रोक सकता था। लेकिन 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध के झटके, आंतरिक कलह, अयोग्य पेशवाओं और अंग्रेजों की चतुर ‘फूट डालो और राज करो’ की कूटनीति ने मराठा परिसंघ (Maratha Confederacy) को भीतर से खोखला कर दिया। चलिए, इसे विस्तृत रूप से समझते हैं।
⚔️ 1. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1782)
प्रिया: सर, प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध की शुरुआत किस वजह से हुई थी? क्या इसमें अंग्रेजों ने सीधा हमला किया था?
अमित सर: नहीं प्रिया, अंग्रेजों को भारत में पैर जमाने का मौका हमेशा भारतीय दरबारों की अंदरूनी गुटबाजी से मिलता था। यहाँ भी शुरुआत मराठा दरबार की आंतरिक राजनीति से हुई:
पृष्ठभूमि व कारण: 1772 में योग्य पेशवा माधवराव की मृत्यु और 1773 में उनके छोटे भाई पेशवा नारायणराव की निर्मम हत्या के बाद, उनके महत्वाकांक्षी चाचा रघुनाथराव (राघोबा) खुद पेशवा बनना चाहते थे। लेकिन नाना फडणवीस के नेतृत्व में मराठा सरदारों ने नारायणराव के मरणोपरांत जन्मे नवजात पुत्र सवाई माधवराव को वैध पेशवा स्वीकार किया और राज्य के संचालन के लिए 12 प्रशासनिक सदस्यों की ‘बारहभाई परिषद’ का गठन किया।
सूरत की संधि (1775): सत्ता के लालच में अंधा होकर राघोबा अंग्रेजों की बॉम्बे काउंसिल के पास चला गया। 6 मार्च 1775 को राघोबा ने अंग्रेजों के साथ सूरत की संधि की, जिसके तहत उसने पेशवा की कुर्सी पाने के बदले अंग्रेजों को साल्सेट (Salsette) और बेसिन (Bassein) के समृद्ध क्षेत्र देने तथा सूरत व भड़ौच के राजस्व का हिस्सा देने का वादा किया। इसी संधि ने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का बिगुल बजाया।
घटनाक्रम व मुख्य संधियाँ:
पुरंदर की संधि (1776): बंगाल के गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने बॉम्बे काउंसिल की सूरत की संधि को अदूरदर्शी और गैर-कानूनी मानकर रद्द कर दिया और कलकत्ता काउंसिल की ओर से कर्नल अप्टन को भेजकर नाना फडणवीस के साथ पुरंदर की संधि (1776) की। इसमें सवाई माधवराव को पेशवा माना गया और राघोबा को पेंशन देकर अलग करने की बात हुई, लेकिन साल्सेट अंग्रेजों के पास ही रहा।
बड़गाँव की लड़ाई व संधि (1779): बॉम्बे काउंसिल ने कलकत्ता के आदेशों को दरकिनार कर राघोबा के समर्थन में पुनः सेना भेजी। 1779 में तलेगाँव और बड़गाँव की लड़ाई में मराठा सेनापति महादजी सिंधिया ने अपनी पारंपरिक छापामार युद्ध नीति (Guerilla Warfare) का इस्तेमाल कर ब्रिटिश सेना को चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें पीने के पानी व रसद से काट दिया। अंग्रेजों को आत्मसमर्पण करना पड़ा और बड़गाँव की अपमानजनक संधि (1779) पर हस्ताक्षर करने पड़े, जिसके तहत उन्हें 1773 के बाद जीते गए सभी मराठा क्षेत्र लौटाने पड़े।
सालबाई की संधि (1782): बड़गाँव की हार से बौखलाए वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल से कैप्टन पोफम और जनरल गॉडार्ड के नेतृत्व में नई सेनाएँ भेजीं। संघर्ष लंबा खिंचने पर महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से 17 मई 1782 को सालबाई की संधि हुई।
परिणाम: सालबाई की संधि से सवाई माधवराव को सर्वसम्मति से पेशवा मान लिया गया, राघोबा को 3 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर राजनीति से बाहर कर दिया गया और साल्सेट अंग्रेजों के पास रहा। इस संधि का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रभाव यह हुआ कि अंग्रेजों और मराठों के बीच 20 वर्षों (1782–1802) के लिए शांति स्थापित हो गई। अंग्रेजों ने इस शांति काल का भरपूर फायदा उठाकर दक्षिण में अपने सबसे बड़े दुश्मन मैसूर (टीपू सुल्तान) का खात्मा कर दिया।
⚔️ 2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805)
रोहन: सर, 20 साल की शांति के बाद दोबारा युद्ध की नौबत क्यों आई?
अमित सर: रोहन, 18वीं सदी के अंत तक मराठा साम्राज्य के स्तंभ ढह चुके थे। 1795 में युवा पेशवा सवाई माधवराव ने आत्महत्या कर ली, 1794 में महादजी सिंधिया और 1800 में ‘मराठों के मैक्यावली’ कहे जाने वाले नाना फडणवीस की मृत्यु हो गई। इसके बाद मराठा दरबारों में कोई दूरदर्शी नेता नहीं बचा।
बेसिन की संधि (1802): राघोबा का अयोग्य, कायर और षड्यंत्रकारी पुत्र बाजीराव द्वितीय नया पेशवा बना। उसने इंदौर के होल्कर शासक जसवंतराव होल्कर के भाई विठोजी की हत्या करवा दी। इससे क्रोधित होकर जसवंतराव होल्कर ने पूना पर आक्रमण कर पेशवा बाजीराव द्वितीय और दौलतराव सिंधिया की संयुक्त सेना को बेहद बुरी तरह हराया। भयभीत पेशवा बाजीराव द्वितीय भागकर अंग्रेजों की शरण में बेसिन चला गया और 31 दिसंबर 1802 को साम्राज्यवादी गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेज़ली के साथ बेसिन की संधि (Subsidiary Alliance / सहायक संधि) पर हस्ताक्षर कर दिए।
बेसिन की संधि की शर्तें व प्रभाव:
पेशवा ने पूना में 6,000 ब्रिटिश सैनिकों की स्थायी तैनाती स्वीकार की और उनके खर्च के लिए 26 लाख रुपये राजस्व वाला क्षेत्र अंग्रेजों को दिया।
पेशवा ने अपनी विदेश नीति अंग्रेजों के सुपुर्द कर दी और बिना ब्रिटिश अनुमति के किसी अन्य विदेशी को सेवा में न रखने का वचन दिया।
इतिहासकार एस.एन. सेन के अनुसार, “बेसिन की संधि ने प्रत्यक्ष रूप से मराठा साम्राज्य को अंग्रेजों के अधीन नहीं बनाया, लेकिन इसने मराठा स्वाधीनता पर अंतिम कील ठोक दी।”
मराठा सरदारों का विरोध व युद्ध: सिंधिया (दौलतराव सिंधिया) और भोसले (रघुजी भोसले द्वितीय) ने बेसिन की संधि को मराठा राष्ट्रीय स्वाभिमान पर कलंक माना और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा दिया। हालाँकि, जसवंतराव होल्कर शुरुआत में अलग थलग रहे।
युद्ध की प्रमुख संधियाँ (Divide and Rule): ऑर्थर वेलेज़ली (दक्षिण भारत) और लॉर्ड लेक (उत्तर भारत) के नेतृत्व में अंग्रेजों ने मराठा सरदारों को एक-एक करके हराया:
देवगाँव की संधि (दिसंबर 1803): रघुजी भोसले की हार के बाद। अंग्रेजों को कटक (उड़ीसा) और बालासोर का पूरा तटीय क्षेत्र मिला।
सुरजी-अर्जनगाँव की संधि (दिसंबर 1803): दौलतराव सिंधिया की हार के बाद। अंग्रेजों को गंगा-यमुना का उपजाऊ दोआब, दिल्ली, आगरा, भड़ौच और बुंदेलखंड का बड़ा हिस्सा मिला। सिंधिया दरबार में ब्रिटिश रेजीडेंट तैनात हुआ।
राजघाट की संधि (1805): देर से युद्ध में उतरे जसवंतराव होल्कर ने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी, लेकिन अंततः लॉर्ड जॉर्ज बारलो के साथ राजघाट की संधि की और चंबल नदी के उत्तर का क्षेत्र अंग्रेजों को छोड़ना पड़ा।
परिणाम: भारत के प्रमुख प्रशासनिक केंद्र—दिल्ली, आगरा और बुंदेलखंड—ब्रिटिश नियंत्रण में आ गए और सभी प्रमुख मराठा दरबारों में ब्रिटिश रेजीडेंट तैनात कर दिए गए।
⚔️ 3. तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1818)
प्रिया: सर, मराठा साम्राज्य का अंतिम पतन और पेशवा पद का अंत इस तृतीय युद्ध में कैसे हुआ?
अमित सर: प्रिया, यह युद्ध मराठों का अपनी खोई हुई संप्रभुता और सम्मान को वापस पाने का एक हताशा भरा, अंतिम प्रयास था।
पृष्ठभूमि व कारण:
बेसिन की संधि के बाद पूना में तैनात ब्रिटिश रेजीडेंट माउंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन पेशवा बाजीराव द्वितीय के आंतरिक मामलों में अत्यधिक हस्तक्षेप कर रहा था।
गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने मध्य भारत में पिंडारियों (जो मराठा सेनाओं के साथ अनियमित सैनिकों के रूप में लड़ते थे) के समूल दमन के लिए सैन्य अभियान चलाया। मराठों ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला माना।
युद्ध पूर्व की दमनकारी संधियाँ (1817): युद्ध शुरू होने से पहले ही लॉर्ड हेस्टिंग्स ने मराठों को अपाहिज कर दिया:
पूना की संधि (जून 1817): अंग्रेजों ने बंदूक की नोक पर पेशवा बाजीराव द्वितीय से मराठा परिसंघ (Confederacy) की अध्यक्षता हमेशा के लिए त्यागने का पत्र लिखवाया।
ग्वालियर की संधि (नवंबर 1817): दौलतराव सिंधिया को मजबूर करके पिंडारी विरोधी अभियान में अंग्रेजों का साथ देने पर सहमत किया गया।
निर्णायक युद्ध व सैन्य टकराव: पेशवा ने नवंबर 1817 में पूना स्थित ब्रिटिश रेजीडेंसी में आग लगा दी और युद्ध की घोषणा कर दी।
पेशवा बाजीराव द्वितीय खड़की (Khadki), कोरेगांव और अश्ती के युद्धों में पराजित हुए।
भोसले (अप्पा साहब) सीताबर्डी की लड़ाई में हारे।
होल्कर (मल्हारराव होल्कर द्वितीय) महिदपुर के युद्ध में पराजित हुए।
इसके बाद जनवरी 1818 में होल्कर के साथ मंदसौर की संधि हुई, जिसके तहत होल्कर ने सहायक संधि स्वीकार की और राजपूताना रियासतों पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
अंतिम परिणाम (1818):
पेशवा पद की समाप्ति: 1818 में पेशवा का पद हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। बाजीराव द्वितीय को आत्मसमर्पण करना पड़ा और उन्हें 8 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन देकर पूना से सुदूर बिठूर (कानपुर) निर्वासित कर दिया गया।
मराठा परिसंघ का विघटन: मराठा साम्राज्य का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
सतारा की रियासत: मराठा भावना को शांत करने के लिए अंग्रेजों ने छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज प्रताप सिंह को ढूँढकर सतारा की एक छोटी सी रियासत का नाममात्र राजा बनाया।
एकछत्र ब्रिटिश राज: मध्य और दक्षिण भारत में कंपनी का अंतिम सशक्त प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गया और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो गया।
📊 आंग्ल-मराठा युद्धों की प्रमुख संधियों की त्वरित तुलना
| संधियाँ (Treaty) | वर्ष (Year) | संबंधित पक्ष (Parties Involved) | मुख्य प्रावधान / परिणाम |
| सूरत की संधि | 1775 | राघोबा एवं बॉम्बे काउंसिल | राघोबा ने पेशवा पद के बदले अंग्रेजों को साल्सेट व बेसिन देने का वादा किया; प्रथम युद्ध शुरू। |
| पुरंदर की संधि | 1776 | नाना फडणवीस एवं वारेन हेस्टिंग्स | सूरत की संधि रद्द; सवाई माधवराव को पेशवा स्वीकार किया गया। |
| बड़गाँव की संधि | 1779 | महादजी सिंधिया एवं ब्रिटिश सेना | बड़गाँव की लड़ाई में अंग्रेजों की हार के बाद अपमानजनक शर्तें स्वीकार। |
| सालबाई की संधि | 1782 | महादजी सिंधिया (मध्यस्थ), वारेन हेस्टिंग्स, नाना फडणवीस | सवाई माधवराव वैध पेशवा बने; 20 वर्षों की शांति स्थापित। |
| बेसिन की संधि | 1802 | पेशवा बाजीराव द्वितीय एवं लॉर्ड वेलेज़ली | पेशवा द्वारा सहायक संधि स्वीकार; मराठा पराधीनता की शुरुआत। |
| देवगाँव की संधि | 1803 | रघुजी भोसले द्वितीय एवं ऑर्थर वेलेज़ली | भोसले की हार; अंग्रेजों को कटक और बालासोर मिला। |
| सुरजी-अर्जनगाँव की संधि | 1803 | दौलतराव सिंधिया एवं अंग्रेज | सिंधिया की हार; गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली, और आगरा पर ब्रिटिश कब्जा। |
| राजघाट की संधि | 1805 | जसवंतराव होल्कर एवं लॉर्ड जॉर्ज बारलो | द्वितीय युद्ध समाप्त; चंबल नदी के उत्तर का क्षेत्र अंग्रेजों के पास। |
| पूना की संधि | 1817 | पेशवा बाजीराव द्वितीय एवं अंग्रेज | पेशवा ने मराठा परिसंघ का प्रमुख पद त्यागा। |
| मंदसौर की संधि | 1818 | मल्हारराव होल्कर द्वितीय एवं अंग्रेज | महिदपुर युद्ध के बाद होल्कर द्वारा सहायक संधि स्वीकार। |
🏛️ 4. मराठा साम्राज्य के पतन के 5 मुख्य कारण
रोहन: सर, जिस मराठा साम्राज्य ने एक समय अटॉक से कटक तक झंडा फहराया था, उसके इतने नाटकीय पतन के मूल कारण क्या थे?
अमित सर: रोहन, इतिहासकार मराठा साम्राज्य के पतन के लिए 5 मुख्य कारणों को जिम्मेदार मानते हैं:
आंतरिक फूट और गुटबाजी (Lack of Internal Unity):
1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद केंद्रीय पेशवा सत्ता कमजोर हो गई। मराठा साम्राज्य 5 प्रमुख सरदारों (पूना के पेशवा, ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, नागपुर के भोसले और बड़ौदा के गायकवाड़) के एक ढीले-ढाले परिसंघ में बदल गया। महादजी सिंधिया और नाना फडणवीस की मृत्यु के बाद इन सरदारों के बीच आपसी ईर्ष्या इतनी बढ़ गई कि वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिलाने लगे।
सैन्य रणनीति का अभाव (Defective Military System):
मराठों की असली ताकत उनकी पारंपरिक, तीव्र और मारक छापेमार युद्ध प्रणाली (Guerilla Warfare / गैनिमी कावा) थी। लेकिन 18वीं सदी के अंत में मराठों ने अपनी इस ताकत को छोड़कर यूरोपीय शैली की मैदानी लड़ाई अपनानी शुरू कर दी। वे न तो पूरी तरह पश्चिमी सैन्य अनुशासन अपना सके और न ही अपनी पुरानी छापामार नीति पर कायम रहे। नतीजतन, वे अंग्रेजों के आधुनिक तोपखाने और अनुशासित पैदल सेना के सामने नहीं टिक सके।
कमजोर कूटनीति और गुप्तचर व्यवस्था (Inferior Diplomacy & Intelligence):
ब्रिटिश अधिकारी और कूटनीतिज्ञ मराठा सरदारों की तुलना में बहुत आगे थे। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया। उन्होंने 1782 में मैसूर के खिलाफ मराठों का इस्तेमाल किया, 1802 में पेशवा को सिंधिया व होल्कर के खिलाफ किया, और 1817 में सिंधिया को तटस्थ रखकर पेशवा को अलग-थलग कर दिया। मराठे अंग्रेजों की चालों को भांपने में नाकाम रहे।
अस्थिर आर्थिक ढाँचा (Weak Economic Structure):
मराठा साम्राज्य के पास कोई सुदृढ़ कृषि, औद्योगिक या व्यापारिक नीति नहीं थी। उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पड़ोसी राज्यों से वसूल किया जाने वाला ‘चौथ’ (कुल राजस्व का 1/4 भाग) और ‘सरदेशमुखी’ (10% अतिरिक्त कर) था। इस जबरन कर वसूली की नीति के कारण राजपूत, सिख, और जाट जैसे अन्य भारतीय शासक मराठों के शत्रु बन गए और संकट के समय किसी ने मराठों का साथ नहीं दिया।
अयोग्य और चरित्रहीन नेतृत्व (Degenerate Leadership):
छत्रपति शिवाजी महाराज, बाजीराव प्रथम और माधवराव प्रथम जैसे महान दूरदर्शी और पराक्रमी नेताओं की तुलना में 19वीं सदी की शुरुआत का मराठा नेतृत्व बेहद कमजोर था। अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय अदूरदर्शी, स्वार्थी और षड्यंत्रकारी था। उसमें न तो सैन्य नेतृत्व की क्षमता थी और न ही अपने सरदारों को एक सूत्र में पिरोने का कौशल।
निष्कर्ष (Conclusion)
आंग्ल-मराठा युद्ध (1775–1818) भारतीय इतिहास का वह निर्णायक मोड़ थे, जिसने भारत की अंतिम महान देशी शक्ति को परास्त कर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारी से भारत का वास्तविक स्वामी बना दिया। मराठों की पराजय केवल सैन्य हार नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक अदूरदर्शिता, आपसी गुटबाजी और आधुनिकता के अभाव की परिणति थी।
— अमित पूनिया
संस्थापक एवं शिक्षक, EnglishEraWithAmitPoonia