भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1906-1914): मुस्लिम लीग, मॉर्ले-मिंटो सुधार और क्रांतिकारी आंदोलन
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का 1906 से 1914 का दौर ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस कालखंड में जहाँ एक तरफ राजनीतिक रूप से मुस्लिम लीग का उदय हुआ, वहीं दूसरी ओर भारतीय युवाओं में सशस्त्र क्रांति का ज्वार उभरा।
1. मुस्लिम लीग की स्थापना (1906)
पृष्ठभूमि (Background):
1905 के ‘बंगाल विभाजन’ के बाद अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” (Divide and Rule) की नीति चरम पर थी। अंग्रेज भारत के बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन (विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ताकत) को कमजोर करने के लिए मुस्लिम समुदाय को अलग राजनीतिक मंच देने हेतु प्रोत्साहित कर रहे थे।
प्रमुख घटनाक्रम:
शिमला शिष्टमंडल (अक्टूबर 1906): आगा खान के नेतृत्व में मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल वायसराय लॉर्ड मिंटो से शिमला में मिला और मुसलमानों के लिए पृथक अधिकारों की मांग की।
स्थापना: 30 दिसंबर 1906 को ढाका में आयोजित ‘ऑल इंडिया मुस्लिम एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस’ के दौरान नवाब सलीमुल्लाह के प्रस्ताव पर ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ का गठन हुआ।
संस्थापक एवं अध्यक्ष: आगा खान, ढाका के नवाब सलीमुल्लाह और मोहसिन-उल-मुल्क। वकार-उल-मुल्क इसके पहले अध्यक्ष बने।
उद्देश्य व प्रभाव:
ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय मुसलमानों में वफादारी बढ़ाना।
मुसलमानों के राजनीतिक और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना।
कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को कम करना (शुरुआती दौर में यह संगठन ब्रिटिश समर्थक रहा)। मुस्लिम लीग की स्थापना ने भारत की भावी राजनीति का रुख बदल दिया।
📜 2. मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909)
पृष्ठभूमि:
1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन और देश में बढ़ते उग्रवाद (Extremism) को शांत करने तथा मुस्लिम लीग की राजनीतिक मांगों को पूरा करने के लिए भारत सचिव जॉन मॉर्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो ने मिलकर इस अधिनियम का ढांचा तैयार किया।
मुख्य प्रावधान (Key Features):
पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate):
मुस्लिम लीग की मांग को स्वीकार करते हुए इसके तहत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे।
यह भारत के संवैधानिक इतिहास में धर्म के आधार पर विभाजन की पहली वैधानिक (Legal) शुरुआत थी।
विधान परिषदों का विस्तार: केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, लेकिन गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत केवल प्रांतों में ही दिया गया।
कार्यकारिणी परिषद में भारतीय: वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में पहली बार किसी भारतीय (सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा) को शामिल किया गया।
ऐतिहासिक प्रभाव:
लॉर्ड मिंटो को “भारत में सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक” (Father of Communal Electorate) कहा गया।
पृथक निर्वाचक मंडल के इस प्रावधान ने, जिसे मुस्लिम लीग का समर्थन प्राप्त था, आगे चलकर 1947 के भारत-पाक विभाजन के बीज बोए।
💣 3. क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रथम चरण (1907-1917)
जहाँ एक ओर राजनीतिक मोर्चे पर मुस्लिम लीग और कांग्रेस अपनी रणनीतियाँ बना रहे थे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में नरमपंथियों की विफलता और अंग्रेजों के दमनकारी रवैये से दुखी होकर युवाओं ने सशस्त्र क्रांति (Armed Revolution) का रास्ता चुना।
(A) भारत में प्रमुख संगठन और घटनाएँ:
1. अनुशीलन समिति और युगांतर (बंगाल):
अनुशीलन समिति: 1902 में बंगाल में स्थापित एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। इसके प्रमुख संस्थापकों में प्रमथनाथ मित्र, सतीश चंद्र बसु और बरिंद्र कुमार घोष शामिल थे।
युगांतर: बरिंद्र घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त ने मिलकर 1906 में ‘युगांतर’ नामक पत्रिका शुरू की और एक आक्रामक गुट बनाया, जिसने गुप्त रूप से हथियारों का निर्माण और अंग्रेज अधिकारियों की हत्या की योजनाएँ बनाईं।
2. चापेकर बंधु (महाराष्ट्र – 1897):
क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआती चिंगारी महाराष्ट्र में जली।
दामोदर हरी चापेकर और बालकृष्ण हरी चापेकर (चापेकर बंधु) ने पुणे में प्लेग महामारी के दौरान जनता पर अत्याचार करने वाले प्लेग कमिश्नर रैंड (Rand) और आयर्स्ट (Ayerst) की गोली मारकर हत्या कर दी। यह भारत में अंग्रेजों की पहली राजनीतिक हत्या थी।
3. मुजफ्फरपुर बमकांड (1908):
घटना: 30 अप्रैल 1908 को 18 वर्षीय खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने बिहार के मुजफ्फरपुर के अत्याचारी जज किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका।
परिणाम: बम दुर्भाग्यवश कैनेडी नामक एक अंग्रेज की गाड़ी पर गिरा, जिससे दो महिलाओं की मौत हो गई।
अंजाम: प्रफुल्ल चाकी ने अंग्रेजों के हाथ आने से पहले खुद को गोली मार ली। खुदीराम बोस पकड़े गए और 11 अगस्त 1908 को उन्हें मात्र 18 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गई। वे स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा शहीदों में से एक बने।
(B) विदेशों में क्रांतिकारी आंदोलन:
1. गदर पार्टी (1913):
स्थापना: 1 नवंबर 1913 को सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में।
मुख्य संस्थापक: लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना (प्रथम अध्यक्ष), और पंडित काशीराम।
‘गदर’ अखबार: पार्टी ने ‘गदर’ नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका निकाली (जो उर्दू, गुरुमुखी और अंग्रेजी में छपती थी)। इसके मुख्य पृष्ठ पर लिखा होता था— “अंग्रेजी राज का कच्चा चिट्ठा”।
उद्देश्य: भारत में मौजूद ब्रिटिश सैनिकों में विद्रोह कराकर सशस्त्र क्रांति द्वारा भारत को आजाद कराना।
2. कामागाटामारू प्रकरण (1914):
क्या था कामागाटामारू? यह एक जापानी भाप इंजन वाला पानी का जहाज (Ship) था।
घटना का क्रम:
पंजाब के एक व्यापारी बाबा गुरदित्त सिंह ने इस जहाज को किराए पर लिया और 376 भारतीय यात्रियों (मुख्यतः सिख और मुस्लिम) को हांगकांग से कनाडा (वैनकुवर) ले जाने के लिए रवाना हुए।
कनाडा सरकार ने एक भेदभावपूर्ण कानून (Direct Passage Provision) के तहत इस जहाज को वैनकुवर बंदरगाह पर उतरने नहीं दिया और दो महीने रोकने के बाद वापस भारत भेज दिया।
बजबज दुर्घटना (कोलकाता): जब यह जहाज सितंबर 1914 में कोलकाता के बजबज बंदरगाह पहुँचा, तो ब्रिटिश पुलिस ने यात्रियों को जबरन पंजाब भेजने की कोशिश की। पुलिस की गोलीबारी में 22 यात्री मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए।
प्रभाव: इस घटना से पूरे देश और विदेशों में बसे भारतीयों में भारी आक्रोश फैल गया, जिसने ‘गदर आंदोलन’ को तुरंत विद्रोह शुरू करने की प्रेरणा दी।
Amit Poonia
Founder & Educator | English Era With Amit Poonia
🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com