स्वराज पार्टी

1. स्वराज पार्टी का गठन (1923): पृष्ठभूमियों और कार्यशैली का विस्तार

(i) यह स्थिति क्यों पैदा हुई? (पृष्ठभूमि)

फरवरी 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन अचानक वापस ले लिया। इस निर्णय से देश के युवाओं और नेताओं में भारी निराशा छा गई। चारों तरफ एक सवाल था—“अब आगे क्या करें?”

अंग्रेज सरकार द्वारा बनाए गए ‘1919 के भारत सरकार अधिनियम’ के तहत 1923 में विधान परिषदों (Councils) के चुनाव होने वाले थे। कांग्रेस के नेताओं के बीच इस बात को लेकर दो गुट बन गए:

  1. अपरिवर्तनवादी (No-Changers): (सदावल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी)। इनका मानना था कि गांधी जी के कहे अनुसार हमें चुनावों का बहिष्कार जारी रखना चाहिए और गाँवों में जाकर चरखा चलाने, छुआछूत मिटाने जैसे रचनात्मक काम करने चाहिए।

  2. परिवर्तनवादी (Pro-Changers): (देशबंधु चित्तरंजन दास और पंडित मोतीलाल नेहरू)। इनका तर्क था कि चुनावों का बहिष्कार करने से कोई फायदा नहीं है। अगर हम चुनाव में भाग नहीं लेंगे, तो अंग्रेज सरकार अपनी मनपसंद चाटुकार भारतीयों को परिषदों में बिठाकर मनमाने कानून पास करवा लेगी।

(ii) स्वराज पार्टी का जन्म और रणनीतियाँ

जब 1922 के ग्या अधिवेशन में सी.आर. दास का प्रस्ताव खारिज हो गया, तो उन्होंने और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के अंदर रहकर ही 1 जनवरी 1923 को ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ का गठन किया।

  • इनका मुख्य उद्देश्य क्या था?

    परिषदों (Samsad/Assemblies) के अंदर जाकर अंग्रेजों की नीतियों में बाधा डालना (Obstructionist Policy)। इनका नारा था: “हम परिषदों को नष्ट करने के लिए उनमें प्रवेश कर रहे हैं।”

  • ऐतिहासिक सफलता (1925):

    स्वराज पार्टी ने परिषदों के अंदर जाकर अंग्रेजों द्वारा लाए गए कई कठोर और अन्यायपूर्ण बिलों को वोटिंग में हरा दिया। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1925 में विट्ठलभाई पटेल (सरदार पटेल के बड़े भाई) का ‘सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली’ का अध्यक्ष (Speaker) चुना जाना था। यह ब्रिटिश भारत के इतिहास में पहली बार था जब कोई भारतीय इस शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठा।

2. साइमन कमीशन (1927) और लाला लाजपत राय का बलिदान

(i) साइमन कमीशन क्यों आया?

1919 के कानून में अंग्रेजों ने यह शर्त रखी थी कि 10 साल बाद (यानी 1929 में) एक आयोग भारत आएगा, जो यह देखेगा कि भारतीय कितना शासन चलाने के योग्य हुए हैं और उन्हें आगे कौन से अधिकार दिए जाने चाहिए।

लेकिन ब्रिटेन में 1929 में चुनाव होने वाले थे। वहाँ की सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी को डर था कि अगर चुनाव में लेबर पार्टी जीत गई, तो वह भारतीयों को ज़्यादा अधिकार दे देगी। इसलिए उन्होंने 10 साल पूरे होने से 2 साल पहले ही यानी नवंबर 1927 में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय ‘साइमन कमीशन‘ का गठन कर दिया।

(ii) भारत में विरोध की मुख्य वजह (‘श्वेत आयोग’)

इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। सभी 7 सदस्य अंग्रेज (ब्रिटिश सांसद) थे। भारतीयों ने इसे अपना सबसे बड़ा अपमान माना। भारतीयों का कहना था:

“भारत के भविष्य का फैसला अंग्रेज करेंगे और उसमें एक भी भारतीय शामिल नहीं होगा? यह हमारे आत्मसम्मान पर सीधा हमला है!”

इसी कारण कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा—सभी ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया। इसे ‘श्वेत आयोग’ (White Commission) कहा गया। 3 फरवरी 1928 को जब यह कमीशन बंबई उतरा, तो पूरे देश में काले झंडे दिखाए गए और “साइमन गो बैक” (Simon Go Back) के नारे गूँज उठे।

(iii) लाला लाजपत राय जी की शहादत (30 अक्टूबर 1928)

लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में विशाल प्रदर्शन हो रहा था, जिसका नेतृत्व ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय कर रहे थे। जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण था।

  • ब्रिटिश क्रूरता: लाहौर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) जे.ए. स्कॉट ने बिना किसी चेतावनी के लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स ने लाला लाजपत राय के सिर और छाती पर जानबूझकर घातक लाठियाँ बरसाईं।

  • ऐतिहासिक पंक्ति: बुरी तरह लहूलुहान होने के बाद भी लाला जी ने गरजकर कहा था:

    “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के कफन की कील साबित होगी।”

  • परिणाम: 17 नवंबर 1928 को लाला जी शहीद हो गए। इस घटना से देश के युवाओं का खून खोल उठा। इसी शहादत का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला जी की हत्या का बदला लिया था।

3. नेहरू रिपोर्ट (1928) एवं जिन्ना के 14 सूत्र (1929)

(i) नेहरू रिपोर्ट क्यों तैयार की गई?

जब पूरे भारत में साइमन कमीशन का हिंसक विरोध हो रहा था, तो भारत के अंग्रेज सचिव ‘लॉर्ड बर्कनहेड’ ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए एक सीधी चुनौती दी:

“तुम भारतीय केवल विरोध करना जानते हो। अगर तुममें इतनी ही क्षमता है, तो एक ऐसा संविधान बनाकर दिखाओ जिस पर भारत के सभी राजनीतिक दल और धर्म एकमत हों!”

भारतीय नेताओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया और फरवरी 1928 में पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय सर्वदलीय समिति बनाई गई। इस समिति ने अगस्त 1928 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे ‘नेहरू रिपोर्ट’ कहा जाता है। (यह भारत का पहला लिखित संवैधानिक ढाँचा था)।

नेहरू रिपोर्ट की मुख्य बातें:

  1. डोमिनियन स्टेटस (अधिराज्य): भारत को ब्रिटेन के अधीन एक स्वशासित राज्य का दर्जा मिले (हालाँकि युवा नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग कर रहे थे)।

  2. मौलिक अधिकार: नागरिकों को 19 मौलिक अधिकार दिए जाएँ (जैसे- भाषण, संगठन बनाने और धर्म की स्वतंत्रता)।

  3. सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की समाप्ति: अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर जो अलग वोटिंग सिस्टम (Separate Electorate) चालू किया था, उसे खत्म करके सभी के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाएँ।

  4. भाषा आधारित राज्य: राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हो।

(ii) जिन्ना के 14 सूत्र (Jinnah’s 14 Points – 1929)

नेहरू रिपोर्ट ने जब ‘पृथक निर्वाचन क्षेत्र’ (Separate Electorates) को खारिज कर दिया, तो मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग इससे असंतुष्ट हो गए।

जिन्ना ने मार्च 1929 में नेहरू रिपोर्ट के जवाब में अपनी 14 माँगें (14 Points) रखीं, जिनमें प्रमुख थीं:

  • मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र बना रहे।

  • केंद्र सरकार में मुसलमानों के लिए कम से कम 1/3 (33%) सीटें आरक्षित हों।

  • मुस्लिम बहुल प्रांतों (पंजाब, बंगाल) में उनका बहुमत बना रहे।

निष्कर्ष: कांग्रेस ने जिन्ना की इन सांप्रदायिक माँगों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण करना चाहती थी। यहाँ से मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच दरार इतनी गहरी हो गई कि आगे चलकर इसने 1947 में भारत के विभाजन का रूप ले लिया।

Amit Poonia

Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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