वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन (1945)
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में (यूरोप में युद्ध समाप्त होने के बाद और जापानी मोर्चे पर युद्ध जारी रहने के दौरान) भारत में जारी राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने के लिए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने जून 1945 में एक योजना प्रस्तुत की, जिसे वेवेल योजना कहा गया। इस योजना पर विचार-विमर्श करने के लिए शिमला में एक सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया।
1. पृष्ठभूमि (Background)
राजनीतिक गतिरोध: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद से कांग्रेस के शीर्ष नेता जेलों में बंद थे और देश में एक राजनीतिक शून्यता बनी हुई थी।
अंतरराष्ट्रीय दबाव: मित्र राष्ट्रों (विशेषकर अमेरिका और चीन) का ब्रिटेन पर दबाव था कि वह युद्ध प्रयासों में भारत का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के लिए राजनीतिक गतिरोध समाप्त करे।
ब्रिटेन में आम चुनाव: ब्रिटेन में जुलाई 1945 में आम चुनाव होने वाले थे। विंस्टन चर्चिल की कंजर्वेटिव पार्टी यह दिखाना चाहती थी कि वह भारत समस्या को सुलझाने के लिए गंभीर है।
2. वेवेल योजना के मुख्य प्रावधान (Key Features of Wavell Plan)
14 जून 1945 को लॉर्ड वेवेल ने रेडियो पर अपनी योजना की घोषणा की, जिसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित थे:
गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन: वायसराय (गवर्नर-जनरल) और कमांडर-इन-चीफ (मुख्य सेनापति) को छोड़कर कार्यकारी परिषद के सभी सदस्य भारतीय होंगे।
समान प्रतिनिधित्व (Equal Representation): कार्यकारी परिषद में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को बराबर (समान) प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
विदेशी मामले (Foreign Affairs): रक्षा विभाग कमांडर-इन-चीफ के पास रहेगा, लेकिन विदेश मामले सहित अन्य सभी विभाग भारतीय सदस्यों को सौंपे जाएँगे।
वीटो पावर (Veto Power): वायसराय का वीटो पावर समाप्त नहीं किया जाएगा, लेकिन इसका प्रयोग बिना वजह या अनियंत्रित रूप से नहीं किया जाएगा।
संविधान सभा का मार्ग: यह एक अंतरिम (temporary) व्यवस्था होगी, जब तक कि युद्ध समाप्त न हो जाए और नए संविधान पर सहमति न बन जाए।
3. शिमला सम्मेलन (Shimla Conference: 25 जून – 14 जुलाई 1945)
वेवेल योजना पर विचार-विमर्श करने और कार्यकारी परिषद के लिए नामांकनों पर चर्चा करने के लिए 25 जून 1945 को शिमला में एक सम्मेलन बुलाया गया।
भागीदारी: सम्मेलन में कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख, अनुसूचित जाति और अन्य दलों के 21 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कांग्रेस का प्रतिनिधित्व: कांग्रेस की ओर से तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने प्रतिनिधित्व किया। (गांधी जी शिमला में उपस्थित थे, लेकिन उन्होंने सम्मेलन में भाग नहीं लिया)।
मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व: मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व किया।
4. सम्मेलन की विफलता के मुख्य कारण (Reasons for Failure)
शिमला सम्मेलन बिना किसी समझौते के 14 जुलाई 1945 को पूरी तरह विफल हो गया। इसके मुख्य कारण थे:
जिन्ना की आक्रामक और अड़ियल नीति:
मुस्लिम नामांकन पर एकाधिकार का दावा: जिन्ना ने शर्त रखी कि कार्यकारी परिषद में शामिल होने वाले सभी मुस्लिम सदस्यों का नामांकन केवल मुस्लिम लीग ही करेगी।
गैर-लीगी मुसलमानों का विरोध: जिन्ना ने यह मानने से इंकार कर दिया कि कांग्रेस (या पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी) किसी मुस्लिम सदस्य का नाम प्रस्तावित कर सकती है।
कांग्रेस का रुख:
कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष (secular) और राष्ट्रीय संस्था थी। वह जिन्ना के इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकती थी कि केवल मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि है।
कांग्रेस ने मुस्लिम कोटे के तहत मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम प्रस्तावित किया, जिसे जिन्ना ने खारिज कर दिया।
लॉर्ड वेवेल की कमजोरी:
वेवेल चाहते तो मुस्लिम लीग की वीटो पावर को खारिज करके सम्मेलन आगे बढ़ा सकते थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार मुस्लिम लीग को नाराज नहीं करना चाहती थी। 14 जुलाई को वेवेल ने एकतरफा सम्मेलन की समाप्ति की घोषणा कर दी।
5. ऐतिहासिक महत्व एवं प्रभाव (Historical Significance)
जिन्ना/मुस्लिम लीग को वीटो पावर: इस सम्मेलन की विफलता ने यह स्थापित कर दिया कि मुस्लिम लीग की सहमति के बिना भारत में कोई भी संवैधानिक बदलाव संभव नहीं है। इसने जिन्ना के कद को अत्यधिक बढ़ा दिया।
सांप्रदायिक विभाजन गहराना: सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को बराबर सीटें देने का प्रावधान सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मान्यता देता था, जिससे देश का सांप्रदायिक विभाजन और गहरा हुआ।
विभाजन का रास्ता साफ होना: शिमला सम्मेलन की विफलता ने यह साबित कर दिया कि एक एकीकृत भारत के ढांचे में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का साथ आना लगभग असंभव था, जिसने अंततः 1947 में भारत विभाजन की नींव मजबूत की।
Amit Poonia
Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia
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