माउंटबेटन योजना (3 जून 1947): भारत का विभाजन और स्वतंत्रता का आधार
माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan), जिसे ‘3 जून योजना’ (3rd June Plan) या ‘डिकी बर्ड प्लान’ भी कहा जाता है, भारतीय इतिहास का वह ऐतिहासिक और निर्णायक दस्तावेज था जिसने ब्रिटिश भारत के विभाजन और दो स्वतंत्र राष्ट्रों—भारत और पाकिस्तान के गठन की रूपरेखा तय की।
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) को और अधिक विस्तार से तथा गहराई से समझने के लिए इसे इसके प्रमुख चरणों, राजनीतिक समीकरणों और इसके दूरगामी परिणामों के माध्यम से समझना आवश्यक है:
1. योजना की पृष्ठभूमि और परिस्थितियाँ (Historical Background)
कैबिनेट मिशन (1946) की विफलता: माउंटबेटन योजना से पहले 1946 में ‘कैबिनेट मिशन’ आया था, जिसने भारत को अखंड रखते हुए एक ढीला ढाँचा (Weak Centre) बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन कांग्रेस (जो एक मजबूत केंद्र चाहती थी) और मुस्लिम लीग (जो अलग पाकिस्तान चाहती थी) के बीच मतभेद के कारण यह योजना पूरी तरह विफल हो गई।
‘डायरेक्ट एक्शन डे’ और सांप्रदायिक दंगे: 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद पूरे देश (विशेषकर बंगाल, बिहार और पंजाब) में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी।
अटली की घोषणा (20 फरवरी 1947): ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमंस में घोषणा की कि ब्रिटेन 30 जून 1948 तक सत्ता भारतीयों को सौंप देगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को नया वायसराय बनाकर भेजा गया।
2. माउंटबेटन का ‘डिकी बर्ड प्लान’ (Plan Balkan)
भारत पहुँचकर माउंटबेटन ने सबसे पहले एक योजना बनाई जिसे ‘डिकी बर्ड प्लान’ (Plan Balkan) कहा गया।
क्या था प्लान बाल्कन?: इस शुरुआती योजना के तहत भारत के प्रत्येक प्रांत और देशी रियासत को यह अधिकार दिया जाना था कि वे स्वतंत्र रहें या भारत/पाकिस्तान में शामिल हों।
नेहरू का विरोध: जब जवाहरलाल नेहरू ने इस योजना का मसौदा देखा, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे भारत दर्जनों छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाएगा (Balkanization of India)। इसके बाद माउंटबेटन ने इस योजना को रद्द कर दिया और एक नई योजना बनाई, जिसे 3 जून योजना (3rd June Plan) कहा गया।
3. ‘3 जून योजना’ के विस्तृत प्रावधान (Key Provisions)
माउंटबेटन ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख नेताओं के साथ लंबी बातचीत के बाद 3 जून 1947 को अपनी अंतिम योजना पेश की:
(i) स्वतंत्रता और तिथि में बदलाव
स्वतंत्रता की समय-सीमा को लगभग एक वर्ष पहले कर दिया गया। सत्ता हस्तांतरण 30 जून 1948 के बजाय 15 अगस्त 1947 तय किया गया।
(ii) दो डोमिनियन का निर्माण
भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राज्य (Dominions) बनेंगे। दोनों को अपना-अपना संविधान बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।
(iii) पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं में मतदान
पंजाब और बंगाल का विभाजन कैसे हो, इसके लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई गई। प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों को दो भागों में बांटा गया—एक मुस्लिम बहुल और दूसरा गैर-मुस्लिम बहुल।
प्रावधान यह था कि यदि कोई भी एक पक्ष साधारण बहुमत से विभाजन का प्रस्ताव पारित कर देता है, तो उस प्रांत का विभाजन कर दिया जाएगा। दोनों प्रांतों में विभाजन का प्रस्ताव पारित हो गया।
(iv) उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) और सिलहट
NWFP: यहाँ खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) का प्रभाव था। योजना में यहाँ यह तय करने के लिए जनमत संग्रह (Referendum) कराया गया कि यह भारत में रहेगा या पाकिस्तान में। गफ्फार खान ने इस जनमत संग्रह का बहिष्कार किया और अंततः NWFP पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
सिलहट (असम): असम के मुस्लिम बहुल जिले ‘सिलहट’ में भी जनमत संग्रह हुआ, जिसने पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प चुना।
(v) रेडक्लिफ आयोग (Boundary Commission)
पंजाब और बंगाल की वास्तविक सीमाओं का निर्धारण करने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो सीमा आयोग बनाए गए। उन्होंने बहुत ही कम समय (मात्र कुछ हफ्तों) में मानचित्र पर रेखा खींची, जिसे रेडक्लिफ लाइन (Radcliffe Line) कहा जाता है।
(vi) देशी रियासतों (Princely States) की स्थिति
भारत में लगभग 565 देशी रियासतें थीं। योजना के अनुसार, ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त हो गई और रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया। वे स्वतंत्र नहीं रह सकती थीं (जिसे बाद में सरदार पटेल ने बखूबी लागू करवाया)।
4. नेताओं द्वारा योजना की स्वीकृति
कांग्रेस का दृष्टिकोण: कांग्रेस हमेशा से ‘अखंड भारत’ की पक्षधर थी। लेकिन सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि निरंतर गृहयुद्ध और अव्यवस्था से बेहतर है कि देश का विभाजन स्वीकार कर लिया जाए ताकि एक मजबूत और केंद्रीय भारत का निर्माण हो सके। गांधीजी विभाजन के खिलाफ थे, लेकिन अंततः उन्होंने भी व्यापक हिंसा रोकने के लिए इसे स्वीकार कर लिया।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण: मोहम्मद अली जिन्ना एक “कटा-छँटा और दीमक लगा” (Truncated and Moth-eaten) पाकिस्तान पाकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि पंजाब और बंगाल का विभाजन हो गया था। फिर भी उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।
5. परिणाम और दूरगामी प्रभाव
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947: इस योजना को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ पारित किया।
विश्व का सबसे बड़ा विस्थापन: विभाजन की घोषणा के साथ ही लगभग 1.5 करोड़ लोगों का सीमा के आर-पार विस्थापन हुआ।
भीषण सांप्रदायिक हिंसा: सीमाओं के अनियोजित और त्वरित निर्धारण के कारण दंगों में अनुमानतः 5 से 10 लाख लोगों की जान चली गई।
दो स्वतंत्र राष्ट्रों का जन्म: 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आए।
Amit Poonia
Founder & Educator | EnglishEraWithAmitPoonia
🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com
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