अलंकार हिंदी व्याकरण: (Figures of Speech) – परिभाषा और भेद
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों या गुणों को अलंकार कहते हैं। जिस प्रकार आभूषण पहनने से मनुष्य की सुंदरता बढ़ जाती है, उसी प्रकार भाषा और काव्य में अलंकारों के प्रयोग से उसका सौंदर्य और प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
अलंकार हिंदी व्याकरण और काव्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सुंदर हिस्सा है। जिस प्रकार आभूषण पहनने से मनुष्य का रूप निखर जाता है, ठीक उसी प्रकार अलंकार भाषा के सौंदर्य, प्रभाव और उसकी गहराई को कई गुना बढ़ा देते हैं। शब्दालंकार जहाँ शब्दों के जादू से चमत्कार पैदा करते हैं, वहीं अर्थालंकार भावों और अर्थ की गहराई से मन को मोह लेते हैं। “स्टॉप मेमोराइजिंग, स्टार्ट अंडरस्टैंडिंग!” के सिद्धांत के साथ इन परिभाषाओं और उदाहरणों को रटने के बजाय इनके मूल भाव को समझकर, आप न केवल हिंदी परीक्षाओं में उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि अपनी लेखन और अभिव्यक्ति की कला को भी अत्यधिक प्रभावशाली और जीवंत बना सकते हैं।
अलंकार हिंदी व्याकरण के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं:
1. शब्दालंकार
जहाँ शब्दों के प्रयोग से काव्य में सौंदर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। यदि उस शब्द की जगह उसका पर्यायवाची (समानार्थी) शब्द रख दिया जाए, तो चमत्कार समाप्त हो जाएगा।
इसके प्रमुख तीन भेद निम्नलिखित हैं:
(क) अनुप्रास अलंकार:
परिभाषा: जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति बार-बार (एक से अधिक बार) होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण: “चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थीं जल थल में।” (यहाँ ‘च’ और ‘ल’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है।)
(ख) यमक अलंकार:
परिभाषा: जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग-अलग (भिन्न) हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण: “कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, या खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।” (यहाँ पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा’ और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ ‘सोना’ है।)
(ग) श्लेष अलंकार:
परिभाषा: जहाँ एक ही शब्द एक ही बार आए, लेकिन उसके अर्थ एक से अधिक (चिपके हुए) निकलें, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण: “रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न उबरै मोती मानुष चून।” (यहाँ ‘पानी’ शब्द का प्रयोग एक बार हुआ है, लेकिन इसके तीन अर्थ हैं—चमक, इज्जत और जल।)
2. अर्थालंकार
जहाँ शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अर्थ के माध्यम से काव्य में सौंदर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। इसमें शब्द बदलने पर भी अर्थ के कारण सौंदर्य बना रहता है।
इसके प्रमुख पाँच भेद निम्नलिखित हैं:
(क) उपमा अलंकार:
परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी दूसरी प्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति से की जाए (समान गुण-धर्म के आधार पर)। इसमें सा, सी, जैसे, सरिस आदि वाचक शब्दों का प्रयोग होता है।
उदाहरण: “पीत सरिस मन डोला।” (मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।)
(ख) रूपक अलंकार:
परिभाषा: जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) में कोई अंतर न दिखाया जाए और दोनों को एक मान लिया जाए (अभेद आरोप)।
उदाहरण: “चरण कमल बंदौं हरि राई।” (यहाँ चरणों को ही कमल मान लिया गया है।)
(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार:
परिभाषा: जहाँ समानता के कारण उपमेय में उपमान की कल्पना या संभावना कर ली जाती है। इसमें मानो, जानो, मनु, जनु आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
उदाहरण: “सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात, मनहुँ नीलमणि सेल पर आतप पर्यो प्रभात।”
(घ) अतिशयोक्ति अलंकार:
परिभाषा: जहाँ किसी बात को बहुत अधिक बढ़ाकर (लोक सीमा से परे) वर्णन किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण: “आगे नदियां पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार? राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।”
(ङ) मानवीकरण अलंकार:
परिभाषा: जहाँ जड़ पदार्थों, प्रकृति या भावनाओं पर मानवीय क्रियाओं (इंसानों जैसा व्यवहार) का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
उदाहरण: “बुलियन हँसती कलियाँ मुसकाईं।” (कलियों का मुसकना इंसानों की तरह दर्शाया गया है।)
Amit Poonia
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