संघवाद

अध्याय 2: संघवाद (Federalism) – विस्तृत टॉपिक्स और नोट्स

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए राजनीति विज्ञान के इस अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय ‘संघवाद’ को आसान और परीक्षा-उपयोगी हिंदी में विस्तार से समझें:

1. संघवाद क्या है? (एकात्मक और संघीय शासन व्यवस्था में अंतर)

  • संघवाद (Federalism) का अर्थ:

    संघवाद सरकार का एक ऐसा प्रारूप है जिसमें सत्ता एक ही केंद्र में केंद्रित न होकर देश की केंद्रीय सरकार और विभिन्न प्रादेशिक या राज्य सरकारों के बीच विभाजित होती है। सामान्यतः इसमें दो स्तर की सरकारें होती हैं—एक पूरे देश के लिए (केंद्र सरकार) और दूसरी प्रांत या राज्य के स्तर पर (राज्य सरकार)।

  • एकात्मक और संघीय शासन व्यवस्था में अंतर:

विशेषताएकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary System)संघीय शासन व्यवस्था (Federal System)
सत्ता का विभाजनसारी ताकत केंद्रीय सरकार के पास होती है। राज्य या प्रांतीय सरकारें यदि होती भी हैं, तो वे पूरी तरह केंद्र के अधीन होती हैं।संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है। दोनों अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं।
निर्णय लेने की स्वतंत्रताकेंद्र सरकार अकेले ही सारे फैसले लेती है, उसे राज्यों की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।कुछ विशेष मामलों या संविधान संशोधन में राज्यों की सहमति या स्वीकृति अनिवार्य होती है।
उदाहरणब्रिटेन, चीन, श्रीलंकाभारत, बेल्जियम, अमेरिका, कनाडा

संघवाद की 7 प्रमुख विशेषताएँ (7 Key Features of Federalism)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए कक्षा 10 राजनीति विज्ञान के इस अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक—संघवाद की सात प्रमुख विशेषताओं—को आसान हिंदी में विस्तार से समझें:

1. सरकार के दो या अधिक स्तर (Two or More Levels of Government)

  • संघीय व्यवस्था में कम से कम दो स्तर (या उससे अधिक) की सरकारें होती हैं।

  • एक सरकार पूरे देश के लिए होती है (जिसे केंद्र सरकार या संघ सरकार कहा जाता है) जो राष्ट्रीय महत्व के मामलों को संभालती है। दूसरी सरकारें प्रादेशिक या राज्य स्तर पर होती हैं (जैसे राज्य सरकारें या प्रांतीय सरकारें) जो दैनिक प्रशासन और स्थानीय मामलों को संभालती हैं।

2. एक ही नागरिकों पर अलग-अलग अधिकार क्षेत्र (Same Citizens, Separate Jurisdictions)

  • भले ही नागरिक एक ही देश और क्षेत्र के होते हैं, लेकिन उनके लिए सरकार के दोनों स्तर अलग-अलग अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) रखते हैं।

  • इसका अर्थ है कि एक ही नागरिक केंद्र और राज्य—दोनों सरकारों के कानूनों और करों (Taxes) के अधीन होता है, लेकिन कानून बनाने, कर वसूलने और प्रशासन चलाने के उनके क्षेत्र संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से तय होते हैं।

3. संविधान द्वारा शक्तियों की मौलिक गारंटी (Constitutional Guarantee of Powers)

  • सरकार के प्रत्येक स्तर (केंद्र और राज्य) के अस्तित्व और प्राधिकार की संवैधानिक गारंटी होती है।

  • इसका मतलब यह है कि केंद्र या राज्य सरकारें अपनी मर्जी से इन अधिकारों को आपस में बदल नहीं सकतीं। दोनों स्तरों की सत्ता और अधिकार सीधे देश के संविधान से ही प्राप्त होते हैं।

4. संविधान के मौलिक प्रावधानों में बदलाव की rigidity (Rigid Constitution)

  • संघीय व्यवस्था में संविधान के बुनियादी या मौलिक प्रावधानों को अकेले कोई एक स्तर की सरकार नहीं बदल सकती।

  • यदि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों के बँटवारे से जुड़े किसी नियम या कानून में बदलाव करना हो, तो उसके लिए सरकार के दोनों स्तरों (केंद्र और राज्य) की सहमति अनिवार्य होती है।

5. अदालतों की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की भूमिका (Supremacy of Courts / Independent Judiciary)

  • अदालतों के पास संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने की शक्ति होती है।

  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) या उच्च न्यायालय एक निष्पक्ष ‘रेफरी’ की भूमिका निभाते हैं। यदि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों या शक्तियों को लेकर कोई विवाद पैदा हो जाए, तो उसका समाधान न्यायपालिका द्वारा ही किया जाता है।

6. वित्तीय स्वायत्तता (Sources of Revenue / Financial Autonomy)

  • वित्तीय स्वतंत्रता के बिना कोई भी सरकार प्रभावी रूप से काम नहीं कर सकती।

  • संघीय व्यवस्था में स्पष्ट किया जाता है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास राजस्व (Tax / आय) के कौन-कौन से स्रोत होंगे। दोनों सरकारें अपने-अपने कार्यों को चलाने के लिए स्वतंत्र रूप से कर लगा सकती हैं और धन जुटा सकती हैं।

7. दोहरे उद्देश्य: देश की एकता और क्षेत्रीय विविधता का सम्मान (Dual Objectives)

  • संघवाद के दो मुख्य और महत्वपूर्ण उद्देश्य होते हैं:

    1. देश की एकता और सुरक्षा को सुरक्षित रखना तथा उसे बढ़ावा देना।

    2. क्षेत्रीय विविधता (Regional Diversity) का पूरा सम्मान करना और उसे अपने साथ जोड़कर रखना।

  • यही कारण है कि संघीय व्यवस्था विभिन्न भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक समूहों वाले बड़े देशों के लिए सबसे उपयुक्त शासन प्रणाली मानी जाती है।

संक्षिप्त सार (Quick Revision)

संघवाद की ये सातों विशेषताएँ मिलकर किसी भी देश को तानाशाही या एकात्मक ताकतों से बचाती हैं और लोकतंत्र को जमीन पर मजबूत करती हैं।

2. भारत में संघीय व्यवस्था (संविधान द्वारा शक्तियों का विभाजन)

भारतीय संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों को स्पष्ट रूप से बाँटने के लिए तीन सूचियाँ (Three Lists) बनाई हैं, जिनका उल्लेख संविधान की सातवीं अनुसूची में है:

  1. संघ सूची (Union List):

    • इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल हैं जैसे—रक्षा, विदेश मामले, बैंकिंग, संचार और मुद्रा (Currency)।

    • इन विषयों पर केवल केंद्र सरकार ही कानून बना सकती है पूरे देश के लिए एक जैसी नीति होती है।

  2. राज्य सूची (State List):

    • इसमें प्रादेशिक और स्थानीय महत्व के विषय शामिल हैं जैसे—पुलिस, व्यापार, कृषि, सिंचाई और वाणिज्य।

    • सामान्यतः इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकारों को होता है।

  3. समवर्ती सूची (Concurrent List):

    • इसमें ऐसे विषय शामिल हैं जो केंद्र और राज्य दोनों के लिए साझा महत्व के हैं जैसे—शिक्षा, वन, मजदूर संघ (Trade Unions), विवाह, और गोद लेना।

    • इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं। यदि दोनों कानूनों में टकराव हो, तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है।

  4. अवशिष्ट विषय (Residuary Subjects):

    • जो विषय तीनों सूचियों में शामिल नहीं हैं (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और आईटी से जुड़े नए विषय), वे अवशिष्ट विषयों के अंतर्गत आते हैं। संविधान के अनुसार इन पर कानून बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है।

3. संघीय व्यवस्था का गठन (साथ आकर संघ बनाना और साथ लेकर चलना)

दुनियाभर में संघीय व्यवस्थाएँ मुख्य रूप से दो तरीकों से बनती हैं:

  1. साथ आकर संघ बनाना (Coming Together Federations):

    • जब स्वतंत्र राज्य अपनी मर्जी से साथ मिलकर एक बड़ा और मजबूत देश बनाते हैं, ताकि उनकी सुरक्षा और संप्रभुता बनी रहे।

    • इसमें सभी घटक राज्यों को आमतौर पर समान ताकत मिलती है और वे केंद्र के मुकाबले अधिक शक्तिशाली होते हैं।

    • उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया।

  2. साथ लेकर चलना (Holding Together Federations):

    • जब एक बड़ा देश अपनी आंतरिक विविधता (विविध संस्कृतियों और भाषाओं) को ध्यान में रखते हुए सत्ता को केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित कर देता है।

    • इसमें केंद्र सरकार अक्सर राज्यों की तुलना में अधिक शक्तिशाली होती है, और कुछ राज्यों को विशेष अधिकार भी दिए जा सकते हैं।

    • उदाहरण: भारत, बेल्जियम और स्पेन।

4. भारत में संघवाद कैसे चलता है? (व्यावहारिक स्वरूप)

भारत में संघवाद केवल कागजी नहीं है, बल्कि इसके सफल संचालन के पीछे लोकतांत्रिक राजनीति की संस्थाएँ और नीतियाँ हैं:

  • भाषाई राज्य (Linguistic States):

    • आज़ादी के बाद 1950 के दशक में भारत के कई पुराने राज्यों की सीमाएँ बदली गईं ताकि एक भाषा बोलने वाले लोग एक ाज्य में रह सकें।

    • आंध्र प्रदेश भाषा के आधार पर बनने वाला पहला राज्य था। इससे देश के टूटने के बजाय एकता और प्रशासनिक कार्यकुशलता मजबूत हुई।

  • भाषा नीति (Language Policy):

    • भारतीय संविधान ने किसी एक भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा नहीं दिया। हिंदी को राजभाषा (Official Language) घोषित किया गया, लेकिन इसके साथ ही संविधान में 22 अन्य भाषाओं को ‘अनुसूचित भाषा’ का दर्जा दिया गया है। सरकारी कामकाज में अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग की भी पूरी छूट है।

  • केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations):

    • लंबे समय तक देश में एक ही पार्टी (कांग्रेस) की सरकार केंद्र और राज्यों में होने के कारण तालमेल आसान था। 1990 के दशक के बाद ‘गठबंधन सरकारों’ (Coalition Governments) का दौर शुरू हुआ, जिससे क्षेत्रीय दलों की ताकत बढ़ी और केंद्र को राज्यों के अधिकारों का अधिक सम्मान करना पड़ा।

5. भारत में विकेंद्रीकरण (पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय शासन)

जब सत्ता को केंद्र और राज्यों से लेकर नीचे स्थानीय स्तर (गाँवों और नगरों) के लोगों को सौंप दिया जाता है, तो इसे विकेंद्रीकरण (Decentralization) कहते हैं।

  • विकेंद्रीकरण की आवश्यकता:

    स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय लोग ही सबसे बेहतर तरीके से कर सकते हैं। इससे आम नागरिकों की लोकतंत्र में सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है।

  • 1992 का ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन (पंचायती राज का मजबूत ढाँचा):

    1992 में संविधान में संशोधन करके त्रि-स्तरीय स्थानीय शासन व्यवस्था को अनिवार्य और शक्तिशाली बनाया गया:

    1. ग्रामीण स्तर पर: ग्राम पंचायत (गाँव स्तर), पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर), और जिला परिषद (जिला स्तर)।

    2. शहरी स्तर पर: नगरपालिकाएँ (छोटे शहरों में) और नगर निगम (बड़े महानगरों में)।

  • प्रमुख विशेषताएँ:

    • स्थानीय निकायों के चुनाव नियमित रूप से कराना अनिवार्य कर दिया गया।

    • महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गईं।

    • चुनावों को निष्पक्ष बनाने के लिए हर राज्य में ‘राज्य चुनाव आयोग’ का गठन किया गया।

संक्षिप्त सारांश (Quick Revision Table)

विषयमुख्य बिंदु / सार
संघवादसत्ता का केंद्र और राज्यों के बीच विभाजन।
तीन सूचियाँसंघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची (शक्तियों का बँटवारा)।
गठन के प्रकार‘साथ आकर संघ बनाना’ (USA) और ‘साथ लेकर चलना’ (भारत)।
भाषाई राज्यभाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (देश को मजबूत करने के लिए)।
विकेंद्रीकरणपंचायती राज और स्थानीय निकायों के माध्यम से जनता को सीधे अधिकार देना।

भारत में कुछ राज्यों को विशेष दर्जा (Special Status in India)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि भारतीय संविधान में कुछ राज्यों को विशेष दर्जा क्यों दिया गया है और इसके मुख्य प्रावधान क्या हैं:

1. राज्यों को विशेष दर्जा क्यों दिया गया? (कारण)

भारत एक अत्यंत विविधताओं भरा देश है। यहाँ कई ऐसे राज्य हैं जिनकी भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पहचान, इतिहास, जनजातीय आबादी या आर्थिक पिछड़ापन अन्य राज्यों से बहुत अलग है।

संविधान में यह व्यवस्था इसलिए की गई ताकि:

  • इन राज्यों की विशिष्ट संस्कृति और जनजातीय अधिकारों की रक्षा की जा सके।

  • प्रशासनिक और वित्तीय सहायता देकर इनके आर्थिक और सामाजिक विकास को गति दी जा सके।

  • सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा और शांति बनाए रखी जा सके।

2. विशेष दर्जे से जुड़े प्रमुख संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान का भाग 21 (Part XXI) अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधानों से संबंधित है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित अनुच्छेद शामिल हैं:

(A) अनुच्छेद 371 (Article 371) — महाराष्ट्र और गुजरात

  • इसके तहत महाराष्ट्र (विदर्भ, मराठवाड़ा) और गुजरात (सौराष्ट्र, कच्छ) के पिछड़े क्षेत्रों के संतुलित विकास के लिए अलग से विकास बोर्ड (Development Boards) बनाने के अधिकार दिए गए हैं।

(B) अनुच्छेद 371A से 371J (पूर्वोत्तर और अन्य राज्य)

पूर्वोत्तर के कई राज्यों तथा दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों को विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं:

  • अनुच्छेद 371A (नागालैंड): नागा समुदाय की धार्मिक, सामाजिक और पारंपरिक प्रथाओं पर भारत की संसद का कोई कानून तब तक लागू नहीं हो सकता जब तक कि नागालैंड की विधानसभा इसके लिए मंजूरी न दे। भूमि और संसाधनों के स्वामित्व का अधिकार भी स्थानीय नागाओं के पास है।

  • अनुच्छेद 371B (असम) एवं 371C (मणिपुर): इन राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों की समस्याओं को हल करने के लिए राज्य विधानसभाओं में विशेष समितियाँ बनाने का प्रावधान है।

  • अनुच्छेद 371D एवं 371E (आंध्र प्रदेश और तेलंगाना): इन राज्यों के निवासियों को शिक्षा और नौकरियों में समान अवसर सुनिश्चित करने के प्रावधान हैं।

  • अनुच्छेद 371F (सिक्किम): 1975 में भारत संघ का हिस्सा बनने के बाद सिक्किम की विशिष्ट संस्कृति, पुरानी व्यवस्था और भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए यह विशेष अनुच्छेद जोड़ा गया।

  • अनुच्छेद 371G (मिज़ोरम): मिज़ो समुदाय की धार्मिक, सामाजिक प्रथाओं और पारंपरिक न्याय प्रणाली को संरक्षण देता है।

  • अनुच्छेद 371H (अरुणाचल प्रदेश): राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए राज्यपाल को विशेष अधिकार प्रदान करता है।

  • अनुच्छेद 371I (गोवा): विधानसभा सीटों की न्यूनतम संख्या और प्रशासनिक प्रावधानों से संबंधित है।

  • अनुच्छेद 371J (कर्नाटक): हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र (पिछड़े जिलों) के विकास के लिए स्थानीय लोगों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का विशेष प्रावधान करता है।

3. इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit – ILP)

पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों—जैसे नागालैंड, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर—में प्रवेश करने और रहने के लिए भारत के अन्य राज्यों के नागरिकों को भी एक विशेष दस्तावेज (ILP) की आवश्यकता होती है। यह व्यवस्था स्थानीय जनजातीय संस्कृति और जनसांख्यिकी (Demographics) की सुरक्षा के लिए बनाई गई है।

4. अनुच्छेद 370 का ऐतिहासिक संदर्भ (जम्मू और कश्मीर)

पूर्व में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर को अपना अलग संविधान और विशेष दर्जा प्राप्त था। हालांकि, अगस्त 2019 में संसद द्वारा इसे समाप्त कर दिया गया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया।

संक्षिप्त निष्कर्ष (Summary)

भारतीय संघवाद की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह “साथ लेकर चलने” (Holding Together) के सिद्धांत पर काम करता है। जरूरत के अनुसार कुछ राज्यों को विशेष अधिकार और दर्जा देना भारत की अखंडता और एकता को मजबूत करता है, कमजोर नहीं।

भारत में केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories in India)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए जानते हैं कि भारत में केंद्र शासित प्रदेश क्या होते हैं, इनकी आवश्यकता क्यों है और वर्तमान में कौन-कौन से केंद्र शासित प्रदेश हैं:

1. केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) क्या हैं?

भारत में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो आकार में बहुत छोटे होने के कारण या किसी विशेष रणनीतिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक कारण से पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं पा सकते। इन क्षेत्रों पर सीधे केंद्र सरकार का नियंत्रण और प्रशासन होता है। इसलिए इन्हें ‘केंद्र शासित प्रदेश’ (संघ राज्य क्षेत्र) कहा जाता है।

  • यहाँ शासन चलाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा प्रशासक (Administrator) या उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) नियुक्त किए जाते हैं।

  • दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर ऐसे केंद्र शासित प्रदेश हैं जहाँ विधानसभाएँ भी हैं और मुख्यमंत्री भी होते हैं, लेकिन अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार के पास ही होता है।

2. केंद्र शासित प्रदेश बनाने के मुख्य कारण (Why are UTs created?)

  • आकार और जनसंख्या की कमी: जो क्षेत्र राज्यों के मुकाबले बहुत छोटे हैं (जैसे लक्षद्वीप या चंडीगढ़), उन्हें अलग राज्य के रूप में चलाना प्रशासनिक और आर्थिक रूप से कठिन होता है।

  • रणनीतिक और सुरक्षा महत्व: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह या लक्षद्वीप देश की मुख्य भूमि से दूर समुद्र में स्थित हैं, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इन पर सीधा केंद्र का नियंत्रण जरूरी है।

  • सांस्कृतिक भिन्नता और सुरक्षा: दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, तथा पुडुचेरी की अपनी अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान रही है, जिसे बनाए रखने के लिए इन्हें केंद्र के अधीन रखा गया।

3. वर्तमान में भारत के केंद्र शासित प्रदेश (Current List of UTs)

वर्तमान में भारत में 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं, जिनकी सूची निम्नलिखित है:

  1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (राजधानी: पोर्ट ब्लेयर)

  2. चंडीगढ़ (राजधानी: चंडीगढ़ – यह पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी भी है)

  3. दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव (राजधानी: दमन)

  4. लक्षद्वीप (राजधानी: कवरत्ती)

  5. दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र – NCT) (राजधानी: नई दिल्ली)

  6. पुडुचेरी (पॉंडीचेरी) (राजधानी: पुडुचेरी)

  7. जम्मू और कश्मीर (राजधानी: श्रीनगर / जम्मू)

  8. लद्दाख (राजधानी: लेह)

संक्षिप्त सार (Quick Revision)

भारत की संघीय व्यवस्था की यह एक अनूठी विशेषता है कि जहाँ बड़े क्षेत्रों को सुचारू चलाने के लिए ‘राज्य’ बनाए गए हैं, वहीं विशेष और छोटे क्षेत्रों को देश की एकता, सुरक्षा और सुचारू प्रशासन के लिए ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के रूप में रखा गया है।

केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बँटवारे में बदलाव की प्रक्रिया

जैसा कि आपने बिल्कुल सही उल्लेख किया, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता का यह बँटवारा हमारे संविधान की बुनियादी बात (Basic Structure) है। यही कारण है कि इसमें बदलाव करना कोई साधारण काम नहीं है।

यदि केंद्र या राज्य सरकारें इस व्यवस्था में कोई फेरबदल करना चाहें, तो इसके लिए एक बेहद सख्त और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:

  1. संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति (Two-Thirds Majority): अकेली संसद अपनी मर्जी से इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकती। इस व्यवस्था में किसी भी बदलाव के प्रस्ताव को पहले संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में कम से कम दो-तिहाई बहुमत (2/3rd Majority) से पारित कराना अनिवार्य होता है।

  2. आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी (Ratification by Half of the States): संसद से पास होने के बाद भी यह कानून तब तक लागू नहीं हो सकता, जब तक देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से इसे मंजूरी (Ratification) न मिल जाए।

इस कड़ी व्यवस्था का महत्व (Why is this process so strict?)

  • संघवाद की सुरक्षा: यदि यह प्रक्रिया आसान होती, तो केंद्र में बैठी कोई भी ताकतवर सरकार राज्यों के अधिकारों को आसानी से छीन सकती थी या खत्म कर सकती थी।

  • विश्वास और संतुलन: यह नियम सुनिश्चित करता है कि भारत की संघीय व्यवस्था मजबूत बनी रहे और केंद्र तथा राज्य दोनों मिलकर आपसी सहमति से ही देश को चलाएं।

संघवाद में न्यायपालिका की भूमिका (Role of Judiciary in Federalism)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि भारतीय संघीय व्यवस्था में न्यायपालिका (Supreme Court & High Courts) की क्या भूमिका है और यह केंद्र व राज्यों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखती है:

1. संविधान के संरक्षक के रूप में (Guardian of the Constitution)

  • भारत का संविधान सबसे सर्वोच्च कानून है, और सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) को इस संविधान का अंतिम व्याख्याकार और संरक्षक माना गया है।

  • न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि केंद्र सरकार या राज्य सरकारें—कोई भी संविधान की सीमाओं का उल्लंघन न करे। यदि सरकार का कोई भी कानून या निर्णय संविधान के खिलाफ जाता है, तो न्यायपालिका उसे अवैध या असंवैधानिक घोषित कर सकती है (जिसे न्यायिक समीक्षा या Judicial Review कहते हैं)।

2. केंद्र और राज्यों के बीच ‘रेफरी’ की भूमिका (Referee in Disputes)

  • चूँकि संघीय व्यवस्था में सत्ता केंद्र और राज्यों के बीच बँटी होती है, इसलिए कई बार अधिकारों को लेकर दोनों के बीच विवाद होना स्वाभाविक है।

  • ऐसी स्थिति में न्यायपालिका एक निष्पक्ष रेफरी की तरह काम करती है। यदि केंद्र और राज्य सरकार के बीच या दो से अधिक राज्यों के बीच शक्तियों के बँटवारे को लेकर कोई भी मतभेद या कानूनी विवाद पैदा हो जाए, तो उसका अंतिम समाधान न्यायपालिका ही करती है।

3. शक्तियों के बँटवारे की रक्षा (Protecting the Division of Powers)

  • न्यायपालिका यह कड़ाई से देखती है कि संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर तय किए गए नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।

  • यदि केंद्र सरकार बिना किसी कानूनी अधिकार के राज्य सूची के किसी विषय में दखل देने की कोशिश करती है, तो अदालतें राज्यों के अधिकारों की रक्षा करती हैं।

संक्षेप में कहें तो: मजबूत न्यायपालिका के बिना कोई भी संघीय व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती। अदालतें ही यह तय करती हैं कि देश में लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा बनी रहे तथा केंद्र और राज्य दोनों मिलकर आपसी सहयोग से देश चला सकें।

भारत की भाषा-नीति (Language Policy of India)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि भारत जैसे बहुभाषी देश में संविधान और लोकतंत्र ने भाषा-नीति को कैसे संभाला है और यह देश की एकता को कैसे मजबूत करती है:

1. कोई ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं (No National Language)

  • भारत के संविधान ने किसी भी एक भाषा को देश की ‘राष्ट्रभाषा’ (National Language) का दर्जा नहीं दिया है।

  • ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं। यदि किसी एक भाषा (जैसे हिंदी) को जबरन राष्ट्रभाषा बना दिया जाता, तो अन्य भाषा बोलने वाले लोग खुद को देश से कटा हुआ महसूस करते। विविधता का सम्मान करने के लिए भारत ने बुद्धिमानी से यह रास्ता चुना।

2. हिंदी और अंग्रेजी राजभाषा (Official Languages)

  • हिंदी: संविधान के अनुसार, केंद्र सरकार के कामकाज के लिए हिंदी को राजभाषा (Official Language) घोषित किया गया है। देश की एक बड़ी आबादी हिंदी बोलती है, इसलिए इसे सरकारी कामकाज में प्राथमिकता दी गई है।

  • अंग्रेजी का उपयोग: चूँकि गैर-हिंदी भाषी राज्यों (विशेषकर दक्षिण भारत) में हिंदी के विरोध की आशंका थी, इसलिए यह तय किया गया कि सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग भी जारी रहेगा। 1965 के बाद भी अंग्रेजी के प्रयोग को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया ताकि प्रशासनिक काम बिना किसी रुकावट के चलते रहें।

3. संविधान द्वारा 22 अनुसूचित भाषाएँ (Scheduled Languages)

  • संविधान की आठवीं अनुसूची (8th Schedule) में कुल 22 भाषाओं को ‘अनुसूचित भाषाएँ’ (Scheduled Languages) का दर्जा दिया गया है।

  • इसमें हिंदी और अंग्रेजी के अलावा तमिल, तेलुगु, बंगाली, गुजराती, मराठी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और असमिया जैसी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएँ शामिल हैं।

  • यदि कोई उम्मीदवार संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या अन्य सरकारी परीक्षाओं में बैठना चाहे, तो वह इन 22 अनुसूचित भाषाओं में से किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकता है।

4. राज्यों की अपनी राजभाषाएँ

  • भारत के प्रत्येक राज्य की अपनी अधिकारिक या राजभाषा होती है। राज्य सरकारें अपने राज्य के भीतर प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों के लिए अपनी स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा का खुलकर उपयोग करती हैं।

भाषा-नीति की सफलता का रहस्य

भारत की भाषा-नीति की दुनिया भर में प्रशंसा की जाती है। अन्य कई देशों (जैसे श्रीलंका या पाकिस्तान) में एक ही भाषा को थोपने के कारण देश में गृहयुद्ध या भाषाई दंगे हुए, लेकिन भारत के नेताओं ने नम्रता और समझदारी दिखाते हुए भाषा के मामले में जो लचीलापन अपनाया, उसने भारत की विविधता को कमजोर करने के बजाय देश की एकता को और अधिक मजबूत किया है।

अमित पूनिया

शिक्षक एवं संस्थापक | इंग्लिश एरा विद अमित पूनिया

🌐 वेबसाइट: englisherawithamitpoonia.com

📱 व्हाट्सएप/कॉल: 6367534099

रटना बंद करें, समझना शुरू करें!

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Scroll to Top
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x