राजनीतिक दलों की ज़रूरत

हमें राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों है? (Need for Political Parties) — कक्षा 10 राजनीति विज्ञान (अध्याय 4)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए कक्षा 10 राजनीति विज्ञान के अध्याय 4 के इस बेहद महत्वपूर्ण और तार्किक हिस्से को समझते हैं—हमें राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों है?

अगर राजनीतिक दल न हों, तो एक आधुनिक लोकतंत्र (Democracy) का क्या हाल होगा? आइए इसे इसके अर्थ, कार्यों और आवश्यकता के जरिए बिल्कुल आसान भाषा में समझें।

1. राजनीतिक दल का अर्थ (Brief Meaning)

जैसा कि हमने पहले भी समझा, राजनीतिक दल लोगों का एक ऐसा संगठित समूह है जो चुनाव लड़ने और सरकार पर कब्जा करने (सत्ता हासिल करने) के लिए आपस में एकजुट होते हैं। ये समाज के सामूहिक हित के लिए कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम तय करते हैं।

2. राजनीतिक दलों के मुख्य कार्य (Functions of Political Parties)

दल हमें क्यों चाहिए, इसे समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि वे समाज और शासन व्यवस्था में क्या-क्या काम करते हैं:

  1. चुनाव लड़ना: चुनाव ज्यादातर राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों के बीच ही लड़े जाते हैं। दल अपने उम्मीदवार का चयन अलग-अलग तरीकों से करते हैं।

  2. नीतियाँ और कार्यक्रम सामने रखना: दल मतदाताओं के सामने अलग-अलग नीतियाँ और कार्यक्रम रखते हैं और मतदाता अपनी पसंद की नीतियाँ चुनते हैं। एक सरकार कईOpinions को एक साथ लेकर चलती है।

  3. कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका: देश के लिए कानून बनाने का काम विधायिका (संसद/विधानसभा) का होता है, लेकिन चूंकि अधिकांश सदस्य किसी न किसी दल के होते हैं, इसलिए वे अपनी पार्टी के नेतृत्व के निर्देश पर ही फैसले लेते हैं।

  4. सरकार बनाना और चलाना: दल चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाते हैं और मंत्रियों को चुनकर देश की नीतियाँ और प्रशासनिक ढांचा चलाते हैं।

  5. विपक्ष की भूमिका निभाना (Opposition Role): जो दल चुनाव हार जाते हैं, वे शासक दल के विरोधी के रूप में काम करते हैं और सरकार की गलत नीतियों या असफलताओं की आलोचना करके जनता के सामने उसकी कमियाँ उजागर करते हैं।

  6. जनमत तैयार करना (Public Opinion): दल समाज के मुद्दों को उठाते हैं, उन पर बहस करवाते हैं और लाखों कार्यकर्ताओं के जरिए पूरे देश में जनमत का निर्माण करते हैं।

  7. कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच: जनता सरकार की मशीनरी तक सीधे नहीं पहुँच सकती। आम लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए स्थानीय पार्टी नेताओं या कार्यकर्ताओं के पास जाते हैं।

3. हमें राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों है? (Why do we need Political Parties?)

अगर हम एक पल के लिए कल्पना करें कि दुनिया में कोई राजनीतिक दल न हो, तो क्या होगा? एनसीईआरटी इस बात को बहुत खूबसूरती से समझाता है:

(A) यदि सारे उम्मीदवार ‘निर्दलीय’ (Independent) हों:

  • यदि चुनाव में खड़े होने वाले सभी उम्मीदवार निर्दलीय होंगे, तो कोई भी उम्मीदवार बड़े नीतिगत बदलावों (Policy Changes) का वादा देश से नहीं कर पाएगा।

  • भले ही वे अपने क्षेत्र के छोटे-मोटे विकास के काम करवा दें, लेकिन पूरी सरकार कैसे चलेगी, देश की आर्थिक नीति कैसी होगी, इन सबकी कोई दूरदर्शी योजना नहीं होगी।

(B) प्रतिनिधियों की जवाबदेही का संकट:

  • बिना राजनीतिक दल के, देश के प्रति जवाबदेह होने वाला कोई संगठन नहीं बचेगा। सरकार कैसे बनेगी और टिकेगी, यह हमेशा अनिश्चित रहेगा।

(C) प्रतिनिधात्मक लोकतंत्र की अनिवार्यता:

  • आज दुनिया के देश बहुत बड़े और आबादी वाले हैं। प्रत्यक्ष लोकतंत्र (जहाँ हर नागरिक बैठकर खुद कानून बनाए) संभव नहीं है।

  • ऐसे में प्रतिनिधात्मक लोकतंत्र (Representative Democracy) के लिए राजनीतिक दलों की जरूरत ‘अनिवार्य’ (Indispensable) है।

एक प्रसिद्ध कथन (NCERT के अनुसार):

राजनीतिक दल ही वह माध्यम हैं जिसके जरिए समाज के विभिन्न विचार सरकार के सामने आते हैं और सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता है। दल लोकतंत्र के लिए उतने ही जरूरी हैं जितना जीवित रहने के लिए साँस लेना।

संक्षेप में (In Short):

राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव लड़ने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे बिखरी हुई जनता को एक दिशा देने, सरकार चलाने, नीतियाँ बनाने और लोकतंत्र को जीवंत रखने का सबसे मजबूत स्तंभ हैं।

कितने राजनीतिक दल? (एकदलीय, द्विदलीय और बहुदलीय व्यवस्था) 

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए कक्षा 10 राजनीति विज्ञान (अध्याय 4: राजनीतिक दल) के इस भाग को समझते हैं कि किसी देश में कितने राजनीतिक दल होने चाहिए और दुनिया भर में कौन-कौन सी दलीय व्यवस्थाएँ (Party Systems) पाई जाती हैं।

दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों की संख्या अलग-अलग होती है। मुख्य रूप से दलीय व्यवस्था को तीन भागों में बाँटा गया है:

1. एकदलीय व्यवस्था (One-Party System)

  • अर्थ: एक ऐसी व्यवस्था जहाँ शासन चलाने और चुनाव लड़ने की अनुमति केवल एक ही राजनीतिक दल को होती है।

  • विशेषता: इसमें विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती और जनता के पास चुनाव में विकल्प (Options) नहीं होते। इसे वास्तव में एक अलोकतांत्रिक (Undemocratic) व्यवस्था माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र की पहली शर्त ही ‘स्वतंत्र विकल्प’ होना है।

  • उदाहरण: चीन (चीन में केवल कम्युनिस्ट पार्टी/चीनी कम्युनिस्ट दल को ही शासन करने का अधिकार है)।

2. द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System)

  • अर्थ: एक ऐसी व्यवस्था जहाँ सत्ता मुख्य रूप से दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच बदलती रहती है।

  • विशेषता: यद्यपि छोटे दल भी चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन सरकार बनाने या मुख्य भूमिका निभाने की ताकत केवल दो बड़े दलों के पास ही होती है। इससे सरकार में स्थिरता (Stability) रहती है और जनता के सामने स्पष्ट विकल्प होता है।

  • उदाहरण:

    • अमेरिका (USA): डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी।

    • ब्रिटेन (UK): कंजर्वेटिव पार्टी और लेबर पार्टी।

3. बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System)

  • अर्थ: एक ऐसी व्यवस्था जहाँ दो से अधिक राजनीतिक दल सत्ता में आने की रेस में होते हैं और किसी भी दल के पास अपने बल पर या दूसरों के साथ मिलकर सरकार बनाने का अवसर होता है।

  • गठबंधन सरकार (Coalition Government): जब बहुदलीय व्यवस्था में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो कई पार्टियाँ मिलकर गठबंधन (Alliance) बनाती हैं और सरकार चलाती हैं।

  • विशेषता: यह व्यवस्था देश की सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं (Diversities) को सबसे बेहतर प्रतिनिधित्व देती है, हालाँकि कई बार इससे राजनीतिक अस्थिरता भी आ सकती है।

  • उदाहरण: भारत (भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर कई दल मौजूद हैं)।

कौन सी व्यवस्था सबसे अच्छी है? (Which System is Best?)

NCERT के अनुसार, दलीय व्यवस्था कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे कोई देश अपनी इच्छा से चुन सके। यह किसी देश के समाज के स्वरूप, उसकी भौगोलिक व सांस्कृतिक विविधता, उसके इतिहास और उसकी चुनावी प्रणाली से लंबे समय में खुद विकसित (Evolve) होती है।

  • जैसे: भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक विविधताओं वाले देश के लिए बहुदलीय व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है, क्योंकि दो या तीन दल भारत की अपार विविधता को अपने में नहीं समेट सकते।

संक्षेप में (In Short):

एकदलीय व्यवस्था तानाशाह रुझान वाली है, द्विदलीय व्यवस्था में स्पष्टता और स्थिरता होती है, और बहुदलीय व्यवस्था विविधता को समाहित करने वाली सबसे समावेशी व्यवस्था है।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल (मानदंड और प्रमुख दल)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल (National Political Parties) किसे कहते हैं, इन्हें मान्यता मिलने के लिए चुनाव आयोग के क्या नियम हैं और भारत के प्रमुख राष्ट्रीय दल कौन-से हैं।

1. राष्ट्रीय दल का अर्थ (What is a National Party?)

भारत जैसे विशाल देश में कुछ राजनीतिक दल ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव पूरे देश में या देश के कई राज्यों में फैला होता है। ऐसे दलों को भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) द्वारा ‘राष्ट्रीय दल’ का दर्जा दिया जाता है।

  • राष्ट्रीय दलों को पूरे देश में एक ही चुनाव चिह्न (Common Symbol) मिलता है और चुनावी प्रक्रिया में विशेष प्राथमिकता मिलती है।

2. राष्ट्रीय दल बनने के लिए चुनाव आयोग के मानदंड (Criteria for a National Party)

भारतीय निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल का दर्जा पाने के लिए निम्नलिखित शर्तों में से कम से कम एक को पूरा करना आवश्यक होता है:

  1. लोकसभा या विधानसभा चुनाव में वोट शेयर:

    • लोकसभा चुनाव या राज्य विधानसभा चुनाव में कम से कम चार अलग-अलग राज्यों में कुल वैध वोटों का 6% वोट हासिल किया हो।

    • इसके साथ ही, उस पार्टी ने कम से कम 4 लोकसभा सीटें भी जीती हों।

  2. लोकसभा सीटों में हिस्सेदारी:

    • लोकसभा के आम चुनाव में कुल सीटों का कम से कम 2% हिस्सा जीता हो।

    • और ये सीटें कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से आई हों।

  3. राज्यीय दल की मान्यता:

    • वह पार्टी कम से कम 4 राज्यों में ‘राज्यीय दल’ (State Party) के रूप में मान्यता प्राप्त हो।

3. भारत के प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल (Major National Parties)

भारत के प्रमुख राष्ट्रीय दल निम्नलिखित हैं:

  1. भारतीय जनता पार्टी (BJP – Bharatiya Janata Party):

    • स्थापना: 1980

    • मुख्य विचार: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सबका साथ-सबका विकास और मजबूत राष्ट्र निर्माण।

  2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC – Indian National Congress):

    • स्थापना: 1885

    • मुख्य विचार: धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, लोकतंत्र और सभी वर्गों का समावेशी विकास।

  3. आम आदमी पार्टी (AAP):

    • मुख्य विचार: सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम जनता के बुनियादी मुद्दों पर आधारित राजनीति।

  4. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)]:

    • मुख्य विचार: समाजवाद, गरीबों, मजदूरों और किसानों के अधिकारों का समर्थन।

  5. बहुजन समाज पार्टी (BSP):

    • स्थापना: 1984

    • मुख्य विचार: सामाजिक न्याय, दलितों और समाज के वंचित वर्गों का राजनीतिक सशक्तिकरण।

  6. नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP):

    • मुख्य विचार: पूर्वोत्तर राज्यों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं और विकास को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना।

संक्षेप में (In Short):

राष्ट्रीय दल देश की राजनीति की मुख्य धुरी होते हैं जो क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नीतियों और मुद्दों पर कार्य करते हैं।

क्षेत्रीय दल (राज्यीय दल और उनका प्रभाव) — कक्षा 10 राजनीति विज्ञान (अध्याय 4)

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि क्षेत्रीय दल (Regional/State Parties) क्या होते हैं, इन्हें मान्यता कैसे मिलती है और भारतीय लोकतंत्र तथा संघवाद में इनका क्या प्रभाव है।

1. क्षेत्रीय दल या राज्यीय दल क्या हैं? (What is a Regional/State Party?)

जरूरी नहीं कि हर दल का प्रभाव पूरे देश में हो। देश के कई दल ऐसे होते हैं जो केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र विशेष तक सीमित होते हैं। ऐसे दलों को राज्यीय दल (State Parties) या आम तौर पर क्षेत्रीय दल कहा जाता है।

  • इन्हें क्षेत्रीय दल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनकी नीतियाँ, मुद्दे और राजनीति मुख्य रूप से उस विशेष क्षेत्र की संस्कृति, भाषा, समस्याओं या क्षेत्रीय आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती हैं।

2. राज्यीय दल बनने के लिए चुनाव आयोग के मानदंड (Criteria for a State Party)

भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के नियमों के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल को ‘राज्यीय दल’ का दर्जा पाने के लिए निम्नलिखित शर्तों में से किसी एक को पूरा करना होता है:

  1. विधानसभा चुनाव में वोट शेयर और सीटें: राज्य की विधानसभा चुनाव में कुल वैध वोटों का कम से कम 6% वोट हासिल किया हो और साथ ही कम से कम 2 सीटें जीती हों।

  2. लोकसभा चुनाव में वोट शेयर: उस राज्य में लोकसभा चुनाव में कुल वैध वोटों का कम से कम 6% वोट प्राप्त किया हो।

  3. विधानसभा सीटों की निश्चित संख्या: राज्य विधानसभा में कुल सीटों का कम से कम 3% हिस्सा या कम से कम 3 सीटें (इनमें से जो भी अधिक हो) जीती हों।

  4. लोकसभा में सीटें: उस राज्य से लोकसभा के लिए प्रत्येक 25 सीटों पर कम से कम 1 सीट जीती हो।

3. भारत के कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दल (Examples of Regional Parties)

भारत के विभिन्न राज्यों में कई शक्तिशाली क्षेत्रीय दल सक्रिय हैं, जो वहाँ की सरकार बनाने या चलाने में अहम भूमिका निभाते हैं:

  • उत्तर प्रदेश: समाजवादी पार्टी (SP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) – नोट: बीएसपी के पास राष्ट्रीय दल का दर्जा भी रहा है।

  • बिहार: जनता दल यूनाइटेड (JDU), राष्ट्रीय जनता दल (RJD)

  • तमिलनाडु: द्रमुक (DMK), अन्नाद्रमुक (AIADMK)

  • पश्चिम बंगाल: अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC)

  • महाराष्ट्र: शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP)

  • पंजाब: शिरोमणि अकाली दल (SAD), आम आदमी पार्टी (AAP – अब राष्ट्रीय दल है पर शुरुआत क्षेत्रीय रूप में हुई)

4. भारतीय लोकतंत्र और संघवाद पर क्षेत्रीय दलों का प्रभाव (Impact of Regional Parties)

पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ा है, जिसके सकारात्मक और महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं:

  1. संघवाद (Federalism) को मजबूती: क्षेत्रीय दलों के आने से केंद्र सरकार अब राज्यों की अनदेखी नहीं कर सकती। यह भारतीय संघवाद को अधिक वास्तविक और मजबूत बनाता है।

  2. गठबंधन सरकारों का दौर (Coalition Era): चूँकि लोकसभा में किसी एक राष्ट्रीय दल को कई बार पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, ऐसे में केंद्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों का समर्थन लेना पड़ता है। इससे केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ता है।

  3. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व: जो स्थानीय मुद्दे या भाषा-संस्कृति से जुड़ी समस्याएँ राष्ट्रीय दल कई बार नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें क्षेत्रीय दल प्रभावी रूप से संसद और विधानसभाओं तक उठाते हैं।

  4. सत्ता का विकेंद्रीकरण: यह क्षेत्रीय लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिक सक्रिय भागीदारी का अवसर देता है।

संक्षेप में (In Short):

क्षेत्रीय दल केवल छोटे दल नहीं हैं, बल्कि वे भारत की विविधता की धड़कन हैं। ये इस बात का प्रतीक हैं कि लोकतंत्र में हर छोटे क्षेत्र, भाषा और संस्कृति की आवाज को सुनना और सम्मान देना जरूरी है।

राजनीतिक दलों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? (Challenges to Political Parties) 

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि लोकतंत्र का मुख्य आधार होने के बावजूद राजनीतिक दलों के सामने कौन-कौन सी गंभीर चुनौतियाँ (Difficulties/Challenges) खड़ी हैं।

NCERT कक्षा 10 के अनुसार, दुनिया भर में राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को लेकर जनता में नाराजगी रहती है। राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर मुख्य रूप से 4 बड़ी चुनौतियाँ पाई जाती हैं:

1. आंतरिक लोकतंत्र की कमी (Lack of Internal Democracy)

  • समस्या: लगभग सभी राजनीतिक दलों में निर्णय लेने और सत्ता की मुख्य चाबी केवल कुछ शीर्ष नेताओं (Top Leaders) के हाथों में सिमट कर रह जाती है।

  • परिणाम:

    • दलों के भीतर नियमित और निष्पक्ष संगठन चुनाव (Organizational Elections) नहीं होते।

    • साधारण कार्यकर्ताओं को पार्टी में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी नहीं मिलती और उन्हें ऊपर उठने का अवसर नहीं मिलता।

    • पार्टी की सदस्यता सूची (Membership Register) भी सही तरीके से नहीं रखी जाती।

    • जो कार्यकर्ता शीर्ष नेताओं की जी-हुज़ूरी या चापलूसी करते हैं, उन्हें ही आगे बढ़ने का मौका मिलता है, जिससे पार्टी के प्रति निष्ठा के बजाय नेताओं के प्रति व्यक्तिगत वफादारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

2. वंशवाद की चुनौती (Dynastic Succession)

  • समस्या: चूँकि दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं होता, इसलिए जो नेता शीर्ष पदों पर बैठे होते हैं, वे अनुचित लाभ उठाकर अपने ही परिवार के लोगों (रिश्तेदारों या बच्चों) को आगे बढ़ाते हैं।

  • परिणाम:

    • ऐसे लोग जो पार्टी में जमीनी स्तर से संघर्ष कर रहे हैं या अनुभवी हैं, वे शीर्ष पदों तक नहीं पहुँच पाते।

    • कई बार जिन लोगों के पास राजनीतिक अनुभव, योग्यता या जनाधार (Public Support) नहीं होता, वे केवल अपने परिवार के नाम पर पार्टी के बड़े पदों और चुनाव टिकटों पर कब्ज़ा कर लेते हैं।

    • यह स्थिति लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है और दुनिया के कई देशों व भारत के कई दलों में देखी जाती है।

3. धन और बल का बढ़ता प्रभाव (Money and Muscle Power)

  • समस्या: चुनावों में केवल जीत हासिल करने के उद्देश्य से राजनीतिक दल अथाह पैसा खर्च करने वाले लोगों और आपराधिक पृष्ठभूमि (Criminal Background) वाले उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं करते।

  • परिणाम:

    • चुनाव जीतने के लिए दल अमीर उद्योगपतियों, व्यवसायियों और कंपनियों से बड़ा चंदा (Funding) लेते हैं। सत्ता में आने के बाद ये पार्टियाँ उन्हीं धनवानों के पक्ष में नीतियाँ बनाने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

    • कई बार चुनाव जीतने की संभावना (Winnability) को देखते हुए आपराधिक रिकॉर्ड वाले बाहुबलियों को भी टिकट दे दिया जाता है, जिससे राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics) होता है और आम शरीफ़ नागरिक राजनीति से दूर होने लगता है।

4. सार्थक विकल्पहीनता (Meaningful Choice to Voters)

  • समस्या: लोकतंत्र में जनता के पास अलग-अलग नीतियों और विचारधाराओं को चुनने का एक स्पष्ट विकल्प (Alternative) होना चाहिए, लेकिन आज अधिकांश राजनीतिक दलों के विचारों और नीतियों में कोई खास अंतर नहीं बचा है।

  • परिणाम:

    • आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर लगभग सभी राजनीतिक दल एक जैसी ही बातें करते हैं।

    • मतदाताओं के सामने यह संकट खड़ा हो जाता है कि वे किसे चुनें, क्योंकि एक दल को हटाकर दूसरे को चुनने पर भी नीतियों में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलता।

    • साथ ही, नेता अक्सर एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होते रहते हैं, जिससे मतदाताओं के पास नए चेहरे चुनने का विकल्प भी सीमित हो जाता है।

संक्षेप में (In Short):

राजनीतिक दलों की ये चार चुनौतियाँ—आंतरिक लोकतंत्र का न होना, परिवारवाद, धन-बाहुबल का बोलबाला और वैचारिक विकल्प की कमी—लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती हैं। इसलिए इनमें आंतरिक सुधार लाना बेहद जरूरी है ताकि लोकतंत्र वास्तविक और जनहितकारी बना रहे।

राजनीतिक दलों को कैसे सुधारा जा सकता है? (Reforms in Political Parties) 

“रटना बंद करें, समझना शुरू करें!” के सिद्धांत के साथ आइए समझते हैं कि हमारे लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों में क्या-क्या सुधार (Reforms) किए गए हैं और भविष्य में क्या कदम उठाए जाने चाहिए।

राजनीतिक दलों में सुधार के लिए प्रयासों को दो भागों में बाँटा गया है: (1) किए गए कानूनी प्रयास और (2) दिए गए प्रमुख सुधार प्रस्ताव।

1. हाल के वर्षों में किए गए कानूनी प्रयास (Legal Efforts Made)

संविधान, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के सुधार के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं:

(A) दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law)

  • समस्या: पहले विधायक और सांसद मंत्री पद या पैसे के लालच में बार-बार अपनी पार्टी बदल लेते थे (जिसे “आया राम, गया राम” की राजनीति कहा जाता था)।

  • सुधार: संविधान में संशोधन करके दलबदल विरोधी कानून बनाया गया।

  • नियम: यदि कोई निर्वाचित विधायक या सांसद अपनी पार्टी बदलता है, तो उसे अपनी सदन की सीट (विधायिकी/सांसदी) गँवानी पड़ेगी। इससे दलबदल में कमी आई है।

(B) संपत्ति और आपराधिक मामलों का हलफ़नामा (Affidavit)

  • समस्या: चुनावों में बाहुबलियों और भ्रष्ट लोगों की भागीदारी।

  • सुधार: उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को एक शपथ-पत्र (Affidavit) दाखिल करना अनिवार्य होगा।

  • नियम: उम्मीदवार को अपनी संपत्ति, देनदारियों और अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का पूरा विवरण सार्वजनिक करना होता है ताकि जनता समझदार फैसला ले सके।

(C) संगठन चुनाव और आयकर रिटर्न (Organizational Elections & Income Tax)

  • समस्या: दलों के भीतर तानाशाही और काले धन का प्रभाव।

  • सुधार: चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के लिए आंतरिक सांगठनिक चुनाव कराना और अपना आयकर रिटर्न (Income Tax Return) दाखिल करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया है।

2. दलों में सुधार के लिए अतिरिक्त सुझाव (Proposals for Further Reforms)

केवल कानून बनाने से सुधार पूरा नहीं होता। विशेषज्ञों और एनसीईआरटी के अनुसार निम्नलिखित सुधार भी आवश्यक हैं:

  1. आंतरिक लोकतंत्र का कानून (Law to Regulate Internal Affairs):

    • राजनीतिक दलों के आंतरिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए कानून बनना चाहिए।

    • सभी दलों के लिए अपने सदस्यों का रजिस्टर रखना, पार्टी के भीतर स्वतंत्र चुनाव कराना और बड़े पदों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होना चाहिए।

  2. महिलाओं के लिए न्यूनतम कोटा (Minimum Representation for Women):

    • राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे चुनाव में कम से कम एक-तिहाई (33%) टिकट महिला उम्मीदवारों को दें।

    • इसके साथ ही पार्टी के प्रमुख निर्णय लेने वाले निकायों में भी महिलाओं की उपस्थिति सुनिश्चित हो।

  3. चुनावों का सरकारी खर्च (State Funding of Elections):

    • धन-बल (Money Power) के प्रभाव को खत्म करने के लिए सरकार को चुनावों का खर्च उठाना चाहिए।

    • सरकार दलों को चुनाव लड़ने के लिए पेट्रोल, कागज़, टेलीफोन या कैश के रूप में एक निश्चित सीमा तक मदद दे सकती है, जिससे अमीर उम्मीदवारों का अनुचित लाभ खत्म हो सके।

3. आम नागरिकों की भूमिका (Role of Ordinary Citizens)

राजनीतिक दलों को केवल बाहर से कानून बनाकर नहीं सुधारा जा सकता, जब तक आम नागरिक और समाज सक्रिय न हों:

  • जनता का दबाव (Public Pressure): आम नागरिक, मीडिया, आंदोलन और दबाव समूह (Pressure Groups) याचिकाओं व अभियानों के माध्यम से खराब नीतियाँ बनाने वाले दलों पर दबाव बना सकते हैं।

  • सक्रिय भागीदारी (Active Participation): जो लोग राजनीति में सुधार चाहते हैं, उन्हें खुद राजनीति में शामिल होना पड़ेगा। “राजनीति को बाहर रहकर केवल कोसने से सुधार नहीं होगा, बल्कि उसमें उतरकर ही सफाई की जा सकती है।”

संक्षेप में (In Short):

राजनीतिक दलों में सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जहाँ सख्त कानून दलबदल और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते हैं, वहीं जागरूक नागरिक और पारदर्शी दलीय व्यवस्था ही लोकतंत्र को वास्तविक रूप से पारदर्शी बनाती है।

अमित पूनिया

शिक्षक एवं संस्थापक | इंग्लिश एरा विद अमित पूनिया

🌐 वेबसाइट: englisherawithamitpoonia.com

📱 व्हाट्सएप/कॉल: 6367534099

रटना बंद करें, समझना शुरू करें!

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