होम रूल लीग

1. होम रूल लीग आंदोलन (Home Rule League Movement – 1916)

📌 पृष्ठभूमि (Background)

1914 से 1918 के बीच पहला विश्व युद्ध (World War I) चल रहा था। अंग्रेजों ने भारतीयों को उनकी सहमति के बिना युद्ध में शामिल कर लिया और भारत के संसाधनों का जमकर इस्तेमाल किया। इससे देश में महंगाई, कर (Taxes) और बेकारी बढ़ी।

इसी दौरान, 1914 में बाल गंगाधर तिलक 6 साल की जेल (मांडले जेल) काटकर बाहर आए। वे और ऐनी बेसेंट (जो आयरलैंड की रहने वाली थीं और ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ से जुड़ी थीं) समझ चुके थे कि अंग्रेजों पर दबाव बनाए बिना राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेंगे। आयरलैंड के ‘स्वशासन आंदोलन’ की तर्ज पर भारत में भी ‘होम रूल’ (गृह शासन/स्वशासन) की नींव रखी गई।

📌 दोनों लीगों का गठन और कार्यक्षेत्र

  1. बाल गंगाधर तिलक की इंडियन होम रूल लीग (अप्रैल 1916):

    • मुख्यालय: पुणे।

    • कार्यक्षेत्र: महाराष्ट्र (बॉम्बे शहर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत (Central Provinces) और बरार।

    • शाखाएँ: केवल 6 शाखाएँ (Branches)।

    • मुख्य माँग: स्वराज, भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन और मातृभाषा में शिक्षा।

    • प्रचार का तरीका: तिलक ने अपने समाचार पत्रों ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी) के माध्यम से देश का दौरा किया। इसी दौरान उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”

  2. ऐनी बेसेंट की ऑल इंडिया होम रूल लीग (सितंबर 1916):

    • मुख्यालय: अड्यार (मद्रास)।

    • कार्यक्षेत्र: तिलक के क्षेत्र को छोड़कर पूरा भारत (जिसमें बॉम्बे शहर भी शामिल था)।

    • शाखाएँ: लगभग 200 से अधिक शाखाएँ।

    • प्रमुख सहयोगी: जवाहरलाल नेहरू, बी. पी. वाडिया, सी. पी. रामास्वामी अय्यर, और जॉर्ज एरुंडेल (जो लीग के संगठन सचिव बने)।

    • प्रचार का तरीका: ऐनी बेसेंट ने अपने समाचार पत्रों ‘न्यू इंडिया’ और ‘कॉमनवील’ के जरिए पर्चे बांटे, सार्वजनिक सभाएँ कीं और पुस्तकालय खोले।

📌 आंदोलन का प्रभाव और महत्व

  • राजनीतिक चेतना: इसने राष्ट्रीय आंदोलन को केवल शहरों और वकीलों तक सीमित न रखकर आम जनता और युवाओं तक पहुँचाया।

  • भविष्य के आंदोलनों की नींव: इस आंदोलन ने जो संगठनात्मक ढांचा और नेटवर्क तैयार किया, उसी का इस्तेमाल आगे चलकर महात्मा गांधी ने अपने ‘असहयोग आंदोलन’ में किया।

  • ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया: जून 1917 में ऐनी बेसेंट को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके विरोध में सुब्रह्मण्यम अय्यर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Sir) की उपाधि त्याग दी। बढ़ते दबाव के कारण अगस्त 1917 में ब्रिटिश सरकार को ‘मांटेग्यू घोषणा’ करनी पड़ी, जिसमें उन्होंने भारत में ‘उत्तरदायी सरकार’ स्थापित करने का वादा किया।

2. लखनऊ समझौता (Lucknow Pact – 1916)

📌 पृष्ठभूमि (Background)

दिसंबर 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लखनऊ में हुआ, जिसकी अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की। इस अधिवेशन को इतिहास में दो बड़ी राजनीतिक सफलताओं के लिए याद किया जाता है:

(A) गरम दल और नरम दल का पुनः एकीकरण

  • कारण: 1907 के ‘सूरत विभाजन’ में कांग्रेस दो भागों में टूट गई थी—नरम दल (Moderates) और गरम दल (Extremists)। सूरत विभाजन के बाद से राष्ट्रीय आंदोलन कमजोर पड़ गया था।

  • एकीकरण के कारक:

    1. गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे पुराने नरमपंथी नेताओं का 1915 में निधन हो गया, जो गरमपंथियों की वापसी के कट्टर विरोधी थे।

    2. ऐनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने दोनों गुटों को मिलाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

    3. दोनों पक्षों को अहसास हो गया था कि अलग-अलग रहकर अंग्रेजों से अधिकार नहीं छीने जा सकते।

(B) कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता (Congress-League Pact)

1906 में बनी ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ शुरुआत में ब्रिटिश समर्थक थी। लेकिन कुछ घटनाओं (जैसे 1911 में बंगाल विभाजन का रद्द होना और प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन द्वारा तुर्की पर हमला) के कारण मुस्लिम लीग अंग्रेजों से दूर होने लगी।

बाल गंगाधर तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना (जो उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के सदस्य थे और उन्हें ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत’ कहा गया) के प्रयासों से दोनों पार्टियाँ एक ही मंच पर आईं।

  • समझौते की मुख्य शर्तें (Features):

    1. पृथक निर्वाचिका की स्वीकृति (Separate Electorates): कांग्रेस ने 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के तहत मुस्लिमों को मिले ‘पृथक निर्वाचन क्षेत्र’ के अधिकार को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया।

    2. अल्पसंख्यकों को संरक्षण: प्रांतीय विधान परिषदों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या तय की गई (जैसे पंजाब और बंगाल में उनकी जनसंख्या के अनुपात से कम, लेकिन यूपी और बिहार जैसे हिंदू बहुल राज्यों में जनसंख्या से अधिक सीटें दी गईं)।

    3. संवैधानिक माँगों पर सहमति: दोनों ने मिलकर ब्रिटिश सरकार के सामने संयुक्त मांगें रखीं—जैसे विधान परिषदों का विस्तार, वायसराय की कार्यकारिणी में 50% भारतीय सदस्य और भारत को जल्द से जल्द स्वशासन देना।

📌 लखनऊ समझौते के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू

सकारात्मक पहलू (Pros)नकारात्मक/आलोचनात्मक पहलू (Cons)
अभूतपूर्व सांप्रदायिक एकता: हिंदू और मुस्लिम एक साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खड़े हुए।तुष्टिकरण की शुरुआत: कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचिका स्वीकार करने से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) की नींव को अनजाने में मजबूती मिली।
राष्ट्रीय आंदोलन की ताकत: दोनों दलों के मिलने से स्वतंत्रता संग्राम की आवाज और अधिक बुलंद हुई।अस्थायी समझौता: यह समझौता नेताओं के स्तर पर हुआ था, आम जनता के दिलों का मिलन नहीं बन सका, जिससे बाद में सांप्रदायिकता फिर उभरी।

मांटेग्यू घोषणा (1917) और होम रूल आंदोलन पर इसका प्रभाव

मांटेग्यू घोषणा (Montagu Declaration), जिसे इतिहास में ‘अगस्त घोषणा’ (August Declaration) के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव था।

1. मांटेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917) क्या थी?

📌 पृष्ठभूमियों के कारण (Background)

  • प्रथम विश्व युद्ध का दबाव: युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को भारत के सहयोग की सख्त जरूरत थी।

  • होम रूल आंदोलन और लखनऊ समझौता: 1916 में तिलक और ऐनी बेसेंट के ‘होम रूल आंदोलन’ तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के ‘लखनऊ समझौते’ ने देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ व्यापक राजनीतिक माहौल बना दिया था।

  • ऐनी बेसेंट की गिरफ्तारी पर विरोध: जून 1917 में ऐनी बेसेंट की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन और उग्र हो गया तथा सुब्रह्मण्यम अय्यर जैसे नेताओं ने अपनी ‘नाइटहुड’ उपाधि तक त्याग दी।

भारतीय असंतोष को शांत करने के लिए ब्रिटेन के तत्कालीन भारत सचिव (Secretary of State for India) एडविन सैमुअल मांटेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) में एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया।

📌 घोषणा के मुख्य बिंदु (Key Provisions)

  1. उत्तरदायी शासन की घोषणा: पहली बार ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया कि उसका लक्ष्य भारत में “उत्तरदायी सरकार” (Responsible Government) की स्थापना करना है।

  2. प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी: भारत सरकार के हर प्रशासनिक विभाग में भारतीयों की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी।

  3. स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास: भारत को एक ही बार में पूर्ण स्वराज न देकर, किश्तों में (Gradual basis) स्वशासी संस्थाओं (Self-governing institutions) का अधिकार दिया जाएगा।

  4. समय का निर्धारण अंग्रेजों के हाथ: विकास की गति और अगली किश्त कब दी जाएगी, इसका निर्णय केवल ब्रिटिश सरकार और संसद ही करेगी (भारतीयों की प्रगति के आधार पर)।

2. होम रूल आंदोलन पर मांटेग्यू घोषणा का प्रभाव (Impact)

मांटेग्यू घोषणा का होम रूल आंदोलन और संपूर्ण राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा:

(A) आंदोलन की रफ्तार धीमी पड़ना और अंत (Deceleration & End)

  • उदारवादियों का संतुष्ट होना: कांग्रेस के उदारवादी नेताओं (Moderates) ने इस घोषणा का स्वागत किया और इसे “भारत का मैग्ना कार्टा” तक कहा।

  • ऐनी बेसेंट का रुख बदलना: सितंबर 1917 में जेल से रिहा होने के बाद ऐनी बेसेंट ने घोषणा का समर्थन किया और माना कि सरकार की नीयत में सुधार हुआ है। इसके बाद उन्होंने अपना आंदोलन धीमा कर दिया और अंततः वापस ले लिया।

(B) राष्ट्रवादियों और कांग्रेस में विभाजन (Split in Nationalist Ranks)

  • उग्रवादियों/तिलक की प्रतिक्रिया: बाल गंगाधर तिलक ने इस घोषणा की आलोचना करते हुए कहा कि— “यह एक बिना सूर्य के प्रातःकाल के समान है।” (यानी ऐसी घोषणा जिसमें वास्तविक अधिकार गायब थे)।

  • राष्ट्रीय उदारवादी संघ (National Liberal Federation) का गठन: घोषणा को लेकर मतभेदों के कारण सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे उदारवादी नेताओं ने 1918 में कांग्रेस छोड़ दी और एक अलग संगठन बना लिया, जिससे कांग्रेस में एक बार फिर फूट पड़ गई।

(C) नेताओं का बिखराव और दिशाहीनता

  • तिलक का लंदन जाना: 1918 के अंत में बाल गंगाधर तिलक पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल पर मानहानि (Defamation case) का मुकदमा लड़ने ब्रिटेन चले गए। मुख्य नेताओं की अनुपस्थिति और गिरफ्तारी से रिहा होने के बाद ऐनी बेसेंट के कमजोर पड़े रुख के कारण आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया।

(D) 1919 के भारत सरकार अधिनियम की नींव (Government of India Act 1919)

  • इसी घोषणा के आधार पर आगे चलकर ‘मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार’ (Montagu-Chelmsford Reforms) तैयार किए गए, जिसके तहत 1919 का अधिनियम बना और प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) लागू हुआ।

📝 निष्कर्ष (Conclusion)

मांटेग्यू घोषणा ब्रिटिश सरकार की एक चतुर कूटनीतिक चाल थी। इसने होम रूल आंदोलन की उस प्रचंड लहर को शांत कर दिया जो पूरे भारत में फैल चुकी थी।

हालाँकि, इस आंदोलन और घोषणा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान यह रहा कि इसने भारतीय जनता को राजनैतिक रूप से जागरूक कर दिया था। इसके बाद जब भारतीयों को 1919 के सुधारों में निराशा हाथ लगी, तो इसी जागरूक जनता का नेतृत्व संभालकर महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को ‘असहयोग आंदोलन’ के रूप में एक विशाल जन-आंदोलन का रूप दिया।

Amit Poonia

Founder & Educator | English Era With Amit Poonia

🌐 Website: englisherawithamitpoonia.com

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